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	<title>Kamal Kumar Singh : Diary</title>
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		<title>भारत में मुस्लिम्स लाचार, बिना अधिकार</title>
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		<pubDate>Wed, 03 Apr 2013 14:13:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>kamal</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[कमल कुमार सिंह]]></category>
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		<description><![CDATA[&#8220;मुस्लिमो को भारत में सच में अधिकार नहीं&#8221; ..­ क्यों ? &#8220;अरे क्योकि हम कह रहे है.&#8221; आप कौन ? &#8220;अरे हमें नहीं जानते, लो स्टैण्डर्ड पीपल, हम हिन्दू मुस्लिम एकता कार्यकर्त्ता के सदस्य, तुम हमें सेकुलर भी कह सकते हैं.&#8221; आप ये कैसे कह सकते की यहाँ उनको कोई अधिकार नहीं है ? कोई [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: justify;">&#8220;मुस्लिमो को भारत में सच में अधिकार नहीं&#8221; ..­</p>
<p style="text-align: justify;">क्यों ?</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;अरे क्योकि हम कह रहे है.&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">आप कौन ?</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;अरे हमें नहीं जानते, लो स्टैण्डर्ड पीपल, हम हिन्दू मुस्लिम एकता कार्यकर्त्ता के सदस्य, तुम हमें सेकुलर भी कह सकते हैं.&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">आप ये कैसे कह सकते की यहाँ उनको कोई अधिकार नहीं है ? कोई वजह ?</p>
<p style="text-align: justify;">
&#8220;कैसे नहीं है का क्या मतलब ? अरे नहीं है ? आप बता दो की कैसे है ? &#8221;</p>
<p>अरे सबकी तरह उनको वोट डालने का अधिकार है , अभिव्यक्ति का अधिकार है , देश सभी सुविधावो का अधिकार है , कुछ धर्मनिरपेक्ष पार्टियों का कहना है की उन्ही का पहला हक़ है, और आप कहते हैं उनको अधिकार नहीं है .</p>
<p>&#8220;आपको पता नहीं है मेरे साम्प्रदायिक भाई , ये जो उनको मिल रहा है देश के सविधान के अधिकार है, जो सबके लिए हैं, लेकिन उनका अधिकार कहाँ है ?ये उनका अधिकार तो नहीं, ये तो वो है, जो यहाँ सबको मिलता है ?&#8221;</p>
<p>तो उनका क्या अधिकार है, और उनके लिए क्या किया जाए या उनको और क्या दिया जाना चाहिए जिससे आपको लगे की उनके भी भारत में अधिकार है, वो भी भारतीय है.</p>
<p>&#8220;तुम कुछ नहीं समझते, शायद तुम आजकल सांप्रदायिक लोगो के साथ रहते हो, कही आर एस एस के तो नहीं ? जरुर संघी होगे जो जरा भी बात भी नहीं समझ में आती. मेरे साम्प्रदायिक भाई, देखो हर मुस्लिम बहुल देशो में सिर्फ उनके ही अधिकार होते, या मुस्लिम बहुल देश तो छोडो, मुस्लिम बहुल भारत क्षत्रो तक में सिर्फ उनके ही अधिकार होते हैं ? बाकी जगह नहीं, पुरे देश में नहीं, है की नहीं अन्याय ? जब वो हमारे भारत के नागरिक है तो उनके ईस्लामिक अधिकारों की रक्षा का हमारा कर्तव्य बनता है, उनको ये छुट होनी चाहिए की वो किसी का जबरजस्ती धर्म परिवर्तन करवाए, लेकिन यहाँ भारत में, गैरमुस्लिम का क़त्ल भी इस्लाम का हवाला दे करवा दे तो ये गुनाह हो जाता है,क्या ये है मुस्लिमो के साथ न्याय ? नहीं हरगिज नहीं ? वो भारत में इस्लाम में नाम पर गैर मुस्लिमो का घर नहीं फूंक सकते ? उनको क़त्ल नहीं कर सकते ? आखिर भारत कर क्या रहा है उनके लिए ? कुछ भी तो नहीं , भाई चारा बढ़ाना है तो उनके अधिकार हमें देने ही होंगे ?&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">क्या आपको लगता है की भारत के मुस्लिमो को इस तरह के अधिकारों की आवश्यकता है ? क्या वो एसा चाहते हैं, क्या आपने उनसे या उनके किसी प्रतिनिधि से बात की है ? क्या उन्होंने ऐसी कोई इक्षा व्यक्त की है ?</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;आ गए न अपने साम्प्रदायिक रंग वाले औकात पे, उनके अधिकारों की बात सुनते ही जल भुन जाते हो तुम सांप्रदायिक लोग, वो चाहे या न चाहे, वो दबे कुचले हैं, उन्हें उनके अधिकारों को याद दिलवाना होगा, तब न चाहेंगे, तुम जैसे साम्प्रदायिक लोग किसी का भला कहाँ होने देते है , क्या अब ये हरित क्रांति वाले क्या गेहू से पूछ के क्रांति करते हैं, सुन्दरलाल बहुगुणा ने पेड़ से पूछ के क्रांति किया था ? मुर्ख कही के,&#8221;</p>
<p>और भाई जी हिन्दू ?</p>
<p>&#8220;ये क्या होता है ?&#8221;</p>
<p>अरे माने बाकी के यहाँ के गैरमुस्लिम ?</p>
<p>&#8220;क्या हुआ उनको ?&#8221;</p>
<p>माने उनके कोई अधिकार नहीं ?</p>
<p>&#8220;तुम फिर लगे सांप्रदायिक बात करने, साले भगवा, तुम लोग मुर्ख हो, तुमसे बात ही करना बेकार है. सालों तुममे न कोई तमीज है न संस्कार, बस आ जाते हो खाकी चढढही पहिन के, तमीज से बात करने की भी अक्ल नहीं, मुर्ख कहीं के, ब्लडी नॉन सेकुलर .&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">एसा कहने वाले आप कौन ?</p>
<p>&#8220;उफ्फ्हो, तुम भगवो और गैर मुस्लिमो को कौन समझाए, तुम लोगो से बात ही करना बेकार है, यू पीपुल आर कम्युनल, नाट स्टैण्डर्ड पीपल टू टाक, कितनी बार बताये, वी आर द सेकुलर, वर्किंग फार हिन्दू मुस्लिम्स ब्रदर हुड. यू फूल नेवर अंडरस्टैंड, सेन्स लेस गाइज, पहले जाओ कुछ पढो लिखो, ज्ञान सीखो, और सबसे पहले मूर्खो बात करने की तमीज सीख के आओ, बेवकूफ ,बेहूदा कहिं के पता नहीं कहाँ कहाँ से आ जाते है खाकी पहिन के .&#8221;</p>
<p style="text-align: justify;">ह्म्म्म जी, वी फूल पीपल &#8230;.</p>
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		<title>मोक्ष की प्राप्ति</title>
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		<pubDate>Wed, 03 Apr 2013 13:03:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>kamal</dc:creator>
				<category><![CDATA[Social]]></category>
		<category><![CDATA[कमल कुमार सिंह]]></category>
		<category><![CDATA[बनारस]]></category>
		<category><![CDATA[वाराणसी]]></category>
		<category><![CDATA[BANARAS]]></category>
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		<description><![CDATA[दिल्ली में मकान  मिलना  मोक्ष मिलने के बराबर है, एक अद्द्द  मकान जहाँ मिला वही आप अपने आपको उतने खुश पाओगे जितने जेहाहदियों को जन्नत मिलने पे  होती है. दिल्ली में बनारस के  इस  खाकसार देशी मुजाहिर को भी इसका ख़ासा अनुभव है . मकान ढूढने के लिए आपको श्री कृष्ण की तरह सोलह कला सम्पन्न  होना आवश्यक [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<div id="attachment_185" class="wp-caption aligncenter" style="width: 279px"><a href="http://kamalkumarsingh.com/?attachment_id=185" rel="attachment wp-att-185"><img class="size-full wp-image-185" alt="kamal" src="http://kamalkumarsingh.com/wp-content/uploads/2013/04/images.jpg" width="269" height="187" /></a><p class="wp-caption-text">kamal</p></div>
<p style="text-align: justify;">दिल्ली में मकान  मिलना  मोक्ष मिलने के बराबर है, एक अद्द्द  मकान जहाँ मिला वही आप अपने आपको उतने खुश पाओगे जितने जेहाहदियों को जन्नत मिलने पे  होती है. दिल्ली में बनारस के  इस  खाकसार देशी मुजाहिर को भी इसका ख़ासा अनुभव है .</p>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">मकान ढूढने के लिए आपको श्री कृष्ण की तरह सोलह कला सम्पन्न  होना आवश्यक है, कम से कम मकान देने वाले  की आवश्यक अपेक्षाएं इतनी या इससे कुछ अधिक  की होती है. है इतने पर भी पुलिस का वेरिफिकेशन करना आवश्यक होता है, आज श्री कृष्ण  होते तो उनका दिल जरुर टूट जाता. वही किरायेदार इसका खासा ख्याल रखता है की जहाँ मकान मिले वहां वहां के आस पड़ोस  रहने वाली बालिकाए भी मकान की तरह  या कुछ जादा खुबसूरत हो जहाँ रहने के आलावा इश्क  करने का काम भी बखूबी किया  जा सके.  वैसे हम  कई  पराक्रमियों  को जानतें है जो अपने ज्ञान का उपयोग कर दोनों  परम स्थितयों को प्राप्त कर चुके है.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">जो रिश्ता संसद में पक्ष और विपक्ष का होता है उससे कम मकान  मालिक और किरदार का रिश्ता तो नहीं  ही होता.पक्ष कहता है हम किराया बढ़ाएंगे, विपक्ष कहता है साल के बीच में बढ़ाना तो सनद में नहि लिखा था. फिर विपक्ष कहता है, आपने दरवाजे  पे लगे दीमक के बारे में क्या किया ? इस महीने ही ही प्रस्ताव दिया था नया पेंट लगवाने का.  नल की टोंटी भी टूटी हुई है, पानी की किल्लत है, बियर पिने को मजबूर करती है. अब जिस दिन माकन मालिक और किराए दार में सुलह की सनद लिखा दी जाएगी उसी दिन संसद में  पक्ष विपक्ष में सुलह होगा  और देश तरक्की करेगा, अब ये कब होता है राम ही जाने.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">गुलाम अली की  भासा में कहा जाए तो दिल्ली शहर में भी घर है बजे की सिर्फ संसद के, जिसमे हजारो लोग के अपने घर हैं, वो बात अलग है की ऐसे हजारो लोगो की नजर  पड़ोस के घर या छत  पर बनाये रखते हैं. लेकिन हम  अभी तक राजा बलि का कलियुगी वर्जन हैं. महीने के पहले दिन ही मकान  मालिक वामन अवतार ले मेरा जेब नाप जाते हैं. राजा बलि निश्चित ही भाग्यशाली थे जो विष्णु से वन टाईम सेटलमेंट कर लिया, और हम बलि से भी सौ गुना पराक्रमी जो हर महीने जानबूझ कर जेब  नपवाने के लिए तैयार है. कुवारी लड़की की तरह महगाई भी घास फुंस की तरह बढती जाती है और इनकम किसी बेहुदे इमानदार के इमानदारी की तरह अडिग. आफत ये की बीच बीच में ज्वार भाटा की तरह मिलनेवाला इंसेटिव भी बस भाटा ही बन रह जाता है ज्वार तो कभी आता ही नहीं.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">इसमें द्वापर के एक  कार्पोरेट ट्रेनर कृष्ण का हाथ है. पुरातन काल में मैनेजमेंट गुरु वेदव्यास के पास एक व्यापारी  समूह पंहुचा.  वेदव्यास उस समय दाढ़ी को हिला हिला उसकी मजबूती चेक कर रहे थे मानो समुन्द्र मंथन में बलि का बकरा वासुकी नाग को नहीं बल्कि उनके दाढ़ी को बनाया गया था. वैसे उस समय वो अविवाहित रहे होंगे, अविवाहित  आदमी अपने बालो और दाढ़ी को ही छेड़ सकता है.</div>
<div style="text-align: justify;">देवताओं को देख दाढ़ी को छेड़ना बंदकर अपनी दिव्य दृष्टी उठायी, “बोलो क्या काम है?” देवता बिना चुके कह उठे  “गुरुवर हमारे एम्प्लोयी पगार और इंसेंटिव बढाने की मांग करते हैं इसके बिना कोई भी भाला, तीर धनुष इत्यादि बनाने को तैयार नहीं है, सारा काम ठाप्प पड़ा हुआ है, अमेरिकवादी भक्त गण  तपस्या कर अश्त्र् शश्त्र की डिमांड करते हैं,  एसा रहा हो तो, हम भी &#8220;वर पूरा&#8221; करने के रोजगार से बोजगार हो जाएगे, और दिवालिया हो  आपकी तरह मैनेजमेंटगुरु बनाने को मजबूर होना पड़ेगा.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">उन दिनों वेदव्यास की दाढ़ी आजकल के नवयुवतियों के बाल की तरह लम्बी थी, उसमे शैम्पू कंडिशनर लगता भी था या नहीं, ये शोध का विषय है. माना जाता है ये अर्थिंग का काम करती थी, जो आसपास के वातारण से ज्ञान सोख दाढ़ी के रास्ते दिमाग को आपूर्ति करती थी.</div>
<div style="text-align: justify;">वेदव्यास व्यस्त थे  या फिर शायद किसी सरकारी कर्मचारी की संगत का असर दिखा टरकाने की गरज से दायें ओर अंगुली दिखा दी जहाँ कृष्ण बासुरी बजाने के बाद पर्स से निकाल राधा का फोटो देख रहे थे.</div>
<div style="text-align: justify;">देवता दल पहुचे व्यथा दुहराई.</div>
<div style="text-align: justify;">कृष्ण ने शंका पूर्वक देख मुस्कराए, फिर मन्त्र दिया,  “कर्मणे वाधिकारस्त , माँ इंसेटिव पगारम  कदाचन: “ फिर बोले, “अब चुकी यह मेरी जबान से निकला है सो जनता अब चुप रहेगी, सरकार के फरमान निकलने के बाद कोई कुछ बोलता है क्या ?</div>
<div style="text-align: justify;"><b>देवता खुश,लगाया उपाय जो काम कर गया. बाद में वो देवता लोग “ हैवेन अर्थ कल्चरल  एक्सचेंज  प्रोग्राम&#8221; के तहत पृथ्वी पे आ मुंशी मैनेजर बन गए, इस्लामिस्ट की तरह वह यहाँ के रंग ढंग और संस्कृति में नहीं ढले आज भी अपने को भगवान् समझते हैं और  जहाँ तहां कटौती करते हैं .</b></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">हाँ अब आईये मुद्दे पे, क्या था ?  मोक्ष , नहीं मकान, हलाकि बात एक ही है.</div>
<div style="text-align: justify;">एक बार ‘मकान एक खोज” के हमने भी  गली गली की धुल फांकी जिससे गलिया धुल मुक्त और साफ़ सुथरी हो गयी, हालाकि ये साफ़ सफाई आजकल बेरोजगार भी बखूबी करते हैं. या यूँ कह सकते हैं सरकार साफ़ सफाई चाहती है इसलिए इन्हें नवयुको को बेरोजगार रखती है.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">काफी  कार्यकर्त्ता प्रयास करने के बाद टिकट रूपी एक पता मिला जहाँ पहुचने पे पता चला की मकान मालिक जी भगवान् को रिश्वत देने की प्रक्रिया में है. एक हाथ में आग लगी अगरबत्ती, और दुसरे हाथ में घंटा लिए भगवान् जी  को घूरे जा रहे थे, बीच बीच में बगल में रखा हुआ सुखा लेकिन मजबूत नारियल की तरफ भी देखते थे मानो कह रहे हो अबकी इक्षा पूरी न की तो यही नारियल  पैर की जगह कहीं और फोड़ दूंगा. दो घंटे तक  घंटे तक भगवान् को धमकाने के बाद उन्होंने हमारे मुखमंडल को निहारा.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">वह  लम्बे वालो एक औरतनुमा मर्द था. शायद देखते ही समझ गया था की मई क्यों आया हूँ . नाक में कानी अंगुली घुसा के नाक से  अंगुली साफ़ करते हुए बोला, “लड़की नहीं लाओगे”, अचानक धमाक से बम फोड़ते हुए  उसने मेरी नब्ज पे हात रख दिया था. मैंने पूर्व में कितनी कोशिश की थी की कोई मकान  मालिक ये शब्द कहे और हम मन मसोस कर रह जाएँ की हाय अब क्या होगा ? कैसे होगा? यहाँ तो उसको ला भी नहीं सकता, लेकिन मेरी अफ़सोस जताने की इक्षा कभी पूरी न हो सकी, जब मुद्दा ही न हो तो अफ़सोस किस बात का ? हालाकि  घर पर प्रेयसी लानो वालो को हम टनो गालियाँ देते थे, जिसको सुनकर कोई विद्वान गाली पुराण या या &#8220;गाली – ये – हदीस&#8221;  लिख जाए तो भविष्य में उत्तर प्रदेश के नेतावो के  इस “विशेष अलंकारिक भासा शब्दकोष”  की “कुंजी” बन सकती थी .</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">“नहीं नहीं आंटी हम उन लंपटो(ऊपर से, मन से उन सौभाग्शाली)  में से नहीं, जो आफिस की बजाय घर पर अवैध कार्य करते हैं”  मैंने दांत निपोर के कहा. वैसे भी वर्तमान सरकार जैसी मेरी  स्थिति नहीं थी की  बाहरी ऍफ़ डी आई घर में लाता.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">फिर काफी देर तक इधर उधर (नौकरी और तनख्वाह मिलने की तारीख)  की बाते करते रहे. फिर नाक में से अंगुली निकाल बनियान में पोछते हुए अगली शर्त रखी “हम लोग शाकाहारी है, हमारे घर में मांस आज तक नहीं पका, तुम भी नहीं  पकाओगे.” मुझे लगा गोया फ़्लैट किराये पे नहीं बल्कि लड़की के साथ ढेर सारा दहेज़ दे  अपनी बात मनवाने की कोशिश कर रहे हों. हँह,  शाकाहारी, क्या भेजा मांस में नहीं आता,  मापने लायक लायक कुछ होता तो  ५ एकड़ खा चूका था . क्या जमाना आ गया है , कभी सुना था बिहार के  एक मुख्यमंत्री माँसाहारी से शाकाहारी हो चुके है,  गाय  बकरा छोड़  उसके चारा को खाना शुरू कर दिया है, और  यहाँ यह दूसरी प्रजाति, शाकाहार  के नाम मेरे दिमाग का बाल्तकार किये जा रहे  है .</div>
<div style="text-align: justify;">&#8220;जी, मुझे  बनाने नहीं आता”,  अपने दातो को दुबारा बाहरी दुनिया दिखाते हुए बोला.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">इसके बाद उन्होंने दो चार क्लाज और रखे जैसे की आमतौर सभी धूर्त रखते हैं और हम उनके शर्तो को जहर की तरह भगवान् शंकर बन आत्मसात करते  रहे.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">मुझे वैसे भी उनकी सारी  बात मानाने में भलाई लगने के कई कारन थे, एक तो मुझे एक नए फ़्लैट की शख्त जरूरत थी दूसरा इनका  लड़का जो इनके बगल में खड़ा मुझे लगातार घूरे जा रहा था,  ६ बाई ३ का एक बढ़िया क्षेत्रफल रखता था , उनकी सारी शर्ते मनानी जरुरी ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य वर्धक भी थी . बाद में सुनने में आया की वह एक  प्रतिभाशाली लुच्चा है, और उसकी दोस्ती एक स्थानीय नेता से भी है और इसी गति से कर्मठ रहा तो भविष्य में उसका प्रमोशन बाद  गैंग्स्टर बनान तय है, और यदि लड़के ने दिमाग लगाया तो नेता जी को निपटा के उनके स्थान पर टिकट भी ले सकता है, नेता जी भी इसी विधि से किराने की दूकान बेच, अपने पथ प्रदर्शक को निपटा  नेता बने थे जैसा की आमतौर पर आजकल के अधिकंश्तात  नेतान्नोमुख लोग करते हैं .  उदहारण के तौर पर केजरीवाल को लिया जा सकता है जो अन्ना को निपटा नेताबाजी का भरपूर मजा ले रहे है .वास्तव में वह एक जिम्मेदार व्यक्ति था, जिम्मेदारी के साथ ठेका ले एक मुश्त वोट डलवाना, जिम्मेदारी के साथ सुनदर स्त्र्री देख दिल पे काबू न कर पाना, जिम्मेदारी के साथ बिना बात के लड़ना उसके विशेष रुचियों में से एक था, सारी बतकही यहाँ बता नहीं सकता, बाकि आप लोग अनुभव से सूंघ सकते है आपके ऊपर छोड़ता हूँ.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">सब मिला के वह कमरा मुझे मिल गया है,  कुल मिला के दो साल का कारावास उसी कमरे में काट चूका  हूँ, अब उस मकान मालिक के लफंगे रत्न को किसी के गले मढने की तयारी की जा रही है, फलतः मुझे कमरा खाली करना है, और एक बार फिर मोक्ष की खोज में निकलना है.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">कमल कुमार सिंह</div>
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		<title>धर्म है या बताशा ?</title>
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		<pubDate>Sun, 10 Feb 2013 15:36:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>kamal</dc:creator>
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		<description><![CDATA[बताशा चीनी को पिघला के उससे बनायी गयी एक मिठाई होती है, जो बहुत ही नाजुक होती है, उसका पानी , शीत, ठन्डे, गर्मी से दूर रखा जाता है, और जब मन हो अपने हिसाब से उसका लुफ्त उठाया जाता है.हलाकि की उसका नाजुक होना लाजिमी है जिसका आधार ही चीनी हो जो तुरंत गलने [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://kamalkumarsingh.com/?attachment_id=179" rel="attachment wp-att-179"><img class="aligncenter size-medium wp-image-179" alt="1357904521" src="http://kamalkumarsingh.com/wp-content/uploads/2013/02/1357904521-300x242.jpg" width="300" height="242" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">बताशा चीनी को पिघला के उससे बनायी गयी एक मिठाई होती है, जो बहुत ही नाजुक होती है, उसका पानी , शीत, ठन्डे, गर्मी से दूर रखा जाता है, और जब मन हो अपने हिसाब से उसका लुफ्त उठाया जाता है.हलाकि की उसका नाजुक होना लाजिमी है जिसका आधार ही चीनी हो जो तुरंत गलने में सहायक है, अब अलिच्छित होने वाले पदार्थ का कितना भी रूप परिवर्तन कर दो गुण दोष धर्म नहीं जाता.</p>
<p style="text-align: justify;">आजकल कुछ एसा ही इस्लाम के साथ भी है, फिल्म आई नहीं की भावना आहत हो गयी, कुछ तो भावनाए सपने में ही आहत कर लेते, मुल्ला सपने में देख रहा है, की कोई एक रोशनी उसके पास आई है, फिर पूछती है, कैसे हो मेरे बच्चा, मुसलमान ने पूछा आप कौन, वह बोला, हम परमेश्वर है, इश्वर है, तुमने हमारी बहुत सेवा की, सोचा तुमसे मिल लू, मुसलमान भड़क गया, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई हमसे मिलने की,कुरआन में नहीं लिखा की तुम मोहम्मद के बाद किसी से मिलोगे, तू निश्चित ही कोई बहरूपिया है, जरा अपना चेहरा दिखा, तेरे घर कहाँ है, मुझे फूंकना है, इश्वर घबराया वह भगा, शायद सोच रहा था जिस मोहम्मद ने इन मानवों को हमारे पास आने का रास्ता दिखाया है वही इंसान हमें बहरूपिया कहता है. और इधर उस मुसलमान की नींद खुल चुकी थी, लेकिन तब उसकी भावनाए आहत हो चुकी थी. बिना सिनेमा देखे जब लोग आहत हो सकते हैं तो सपना तो फिर भी दीखता है.</p>
<p style="text-align: justify;">अब कश्मीर के बैंड पर एक मुल्ला द्वारा बैन लगाया है, और बाकी मुल्ले उसका समर्थन कर रहे, बाकि के  मुसलमान चुप है  और जो &#8220;इस्लाम में औरत&#8221; टाइप के लेख लिखते हैं, वो कहीं दूम दबा के छुप चुके है, जो मुसलमान औरत की आजादी के दीवाने है, उनकी दीवानगी उनसे बेवफा हो गयी है. उनके इस तरह के मौके पर छुपने से कसम से मेरी भावनाए आहत होती, और मन करता है उनके आगे पीछे जहाँ भी जगह मिले बांस ठूंस दूँ. इस्लाम या है , इस्लाम वा है, हाँ इन सब को देखते हुए यही लगता है की इस्लाम या और वा ही है और इसकी मान्यते भी &#8220;या&#8221; और &#8220;वा&#8221; ही है इससे जादा कुछ नहीं.</p>
<p style="text-align: justify;">सिनेमा से इस्लाम आहत होता है, और मुस्लिम बहुल (कश्मीर) क्षेत्र को आहत करने के लिए संगीत ही काफी है. इस्लाम धर्म है या बताशा ? अब जरा सोचिये क्या डेल्ही या मुंबई में इस तरह के फतवे या धमकिया आती तो क्या लडकिय बैंड बंद कर देती ? या धमकी देने वाले से डरती ?शायद कोई धमकी ही नहीं देता, नहीं देता तो क्यों  ? सोचने वाली बात है. एक समझदार व्यक्ति को ये सब हरकते देख यही समझ आएगा की समझ में इस्लाम् मोम की गुडिया है, आग से पिघल जाती है, पानी से और ठोस हो जाती है, जिससे आतंक की बारिश होती है, फिर विनाश की &#8220;धुप&#8221; फैलाती है, जिसमें नहा के इस्लाम परस्तो की मोम से भावना की गुडिया तैयार होती है, और फिर मुसलमान कहते फिरते हैं की देखो इस्लाम तो कितना कोमल और सुन्दर है मोम की गुडिया जैसे.</p>
<p style="text-align: justify;">कश्मीर की घटना आज के आधुनिक भारत में इस बात का सुबूत है की की मुस्लिम जहाँ भी बहुसंख्यक हुए, वो देश और संविधान से ऊपर समझने लगते है. मुख्या मंत्री ओमर अब्दुल्ला की हालत एक वैसे पिता की है जो अपने लडके से जादा प्यार करता है और वही लड़का जब किसी लड़की को छेड़ता है तो बस विरोध की कर सकता है, मार या भगा नहीं सकता आखिर लाडला लड़का जो ठहरा मुल्ले मौलवी भी इस्लामिक शाशको के लिए कुछ इ इसी तरह के है, हाँ कश्मीर में में लोकतान्त्रिक नहीं बल्कि मुल्ला तंत्र कहना जादा उचित होगा क्योकि वहां कुछ भारतीय संविधान के अनुरूप नहीं है. नहीं तो क्या शाशन सच में इतनी मजबूर हो सकती है ? यदि हाँ तो ओमर अब्दुल्ला ही इन सब के जड़ माने जायेंग और इसका भी मतलब यही निकलता है की मुसलमान शाशक भी पहले &#8220;मुसलमान&#8221; और देश के संविधान के हिसाब से शाशक बाद में होता है और ये सब हम पकिस्तान या तालिबान में नहीं बल्कि अपने देश भारत में देख रहे हैं.</p>
<p style="text-align: justify;">सबसे बड़ी समस्या ये है की भारत में मुसलमान इस तरह की हरकते करते हैं और ऊपर से &#8221; सेकुलरिज्म&#8221; की उम्म्मीद रखते है. अरे भाई जब तुम अपनी बताशे बाजी कर रहे हो, और बाकी के बताशेबाज तुम्हारा समर्थन ( विरोध न करना भी समर्थन ही है ) तो जाहिर सी बात है गैर बताशेबाज हमेशा तुम्हारे करीब नहीं आ सकता फिर काहे का सेकुलरिज्म ? फिर कहते हो भेदभाव किया जाता है जबकि शुरुवात हमेशा मुस्लिम्स ही करते है. इस तरह तरह के फ़तवो और मुसलमानों के विरोध से बड़ा तबका हिन्दू इनके करीब नहीं आ सकता.जो बहुमत में राष्ट्रवादी है वो भारतीय सम्विधान का अपमान करने वालो के साथ कैसे आ सकते है ? जो कहते है की ये सब बाते कर के खाई मत बढ!वो, वो अपने मुल्ले और मौलवियों पे लगाम लगाने में ही असमर्थ है, और हम जैसो पर इलज़ाम लगता है की की मौका ढूंढ कर हम बदनाम कर रहे हैं, तो मेरे भाई, पहले अपने सांडो को खुरापात करने से रोको,  क्यों मौका देते हो ये सब करने का ? और यदि तुम्हारी जमात में कोई एसा करता भी है तो क्यों नहीं उसका सड़को पर उतर के विरोध करते जो बात बात पे करने में माहिर हो, सड़क पे उतर कर तोड़ फाड़ करना आपकी फेवरेट होबी है, लेकिन आप उस समय नहीं उतर सकते जब तक वह इस्लाम से सम्बन्धित न हो.अब ये न कहना की झूठा इलज़ाम लगाया है, तोड़ फोड़ तो हम पुरानी वस्तुवों की करते है ताकि नयी वस्तुवों का निर्माण हो सके, जिससे राष्ट्र प्रगति करे, खैर एसा ये जमात कहती है तो कोई आश्चर्य नहीं.</p>
<p style="text-align: justify;">चलो ठीक है, इस्लाम में औरत की आजादी नहीं लेकिन आप भारत में हैं तालिबान में नहीं, यदि भारत के तौर तरीके आपको नहीं पसंद तो बेशक पाकिस्तान  या तालिबान  जा सकते हैं, हम जैसो को कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि उलटे हम आपकी मदद करेंगे अपना देश का कूड़ा साफ़ करने में. ऐसे मौको पे मिडिया, और मानवाधिकार की दुआई देने वाले बुध्ध्जिवियो सहित अपने अपने बीवी के पहलू में जा छुपते है और वहां देखने की कोशिश करते है की नारी कितनी महान है. इस तरह की हरकते सिर्फ मुल्ले करते हैं और बाकी मुसलमान उनका समर्थन करते है, उनका चुप रहना भी समर्थन ही माँ जायेगा क्योकि हिन्दू कभी विरोध करने में पीछे नहीं रहा है यदि कोई ढोंगी समाज में आ जाये तो . अब यदि मुसलंमान समर्थन नहीं करते तो चुप क्यों है जो  मस्जिद पे गुलाल भर गिरने से आगजनी और दंगो पर उतर आती है .</p>
<p style="text-align: justify;">मुझे समझ में नहीं आता की भारत धर्म निरपेक्ष है या सिर्फ इस्लाम परस्त? यदि इन साब बातो को ध्यान में रख अशोक सिंघल जैसे लोग यह कहे की भारत हिन्दू बहुल है इसको हिन्दू राष्ट्र बनाना है, उसके बाद मुसलमान को दोयम दर्जे का नागरिक तो मई बिलकुल भी असहमत नहीं हूँ. और किसी को भी नहीं होना चाहिए, क्योकि इस्लाम बहुल होते ही फ़तवा और हवा में कोई अंतर नहीं जो की चलती ही रहती है.</p>
<p style="text-align: justify;">हे मेरे मुसलमान दोस्तों या तो आप सडक पर उतर के विरोध करो या हम मान लेंगे आप समर्थन में हो. यदि आप समर्थन में हो तो अशोक सिंघल जैसे लोग बिलकुल सही और वाजिब है, और भगवा आतंकवाद नहीं है तो अब उनका होना भी किसी प्रकार से गलत नहीं. इंसानियत को इस्लामियत से ऊपर रखे, इंसान बने. हाँ इस्लाम के नियम क़ानून कायदे बनाने और उनको फालो करने है तो माफ़ करें, तालिबानियों के लिए भारत उचित जगह नहीं, हमारा भारत बक्श दें, हमें शांति से जीने दे. राष्ट्वादियों में सहिष्णुता का लोप मुल्लाओ के क्रिया कलापों से होता है और मुसलमानों की चुप्पी उसे पुख्ता बनाती है, इसके लिए राष्ट्रवादी जिम्मेदार नहीं.</p>
<p style="text-align: justify;">&#8220;पहले आ बल मुझे मार कहता है , फ़िर मार दिया तो &#8220;मार दिया &#8221;  कहता  है.</p>
<p style="text-align: justify;">सादर</p>
<p style="text-align: justify;">कमल कुमार सिंह</p>
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		<title>बलात्कार का बलात्कार</title>
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		<pubDate>Mon, 24 Dec 2012 07:48:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>kamal</dc:creator>
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		<category><![CDATA[कमल कुमार सिंह]]></category>
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		<category><![CDATA[rape]]></category>

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		<description><![CDATA[&#160; बलात्कार शब्द जह इंसानियत पर एक धब्बा ही नहीं बल्कि गढ्ढा है वहीँ बालात्कार का बालात्कार करना एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया और सम्मान जनक कृत्य है.  ये क्रिया कुछ खास  किस्म के बुध्दजीवियों द्वारा की जाती है. बाल्तकार का बालात्कार करने से बालात्कारी का कुछ बिगड़े या न बिगड़े लेकिन इन ख़ास प्रकार के बुध्ध्जिवियों [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<div><a href="http://4.bp.blogspot.com/-64nx75ySfvM/UNc2UckPQ0I/AAAAAAAADD8/RQoQNukJ9Qw/s1600/The_Rape_of_the_Sabine_Women.jpg"><img src="http://4.bp.blogspot.com/-64nx75ySfvM/UNc2UckPQ0I/AAAAAAAADD8/RQoQNukJ9Qw/s320/The_Rape_of_the_Sabine_Women.jpg" alt="" width="320" height="235" border="0" /></a></div>
<div></div>
<p style="text-align: justify;">बलात्कार शब्द जह इंसानियत पर एक धब्बा ही नहीं बल्कि गढ्ढा है वहीँ बालात्कार का बालात्कार करना एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया और सम्मान जनक कृत्य है.  ये क्रिया कुछ खास  किस्म के बुध्दजीवियों द्वारा की जाती है.</p>
<p style="text-align: justify;">बाल्तकार का बालात्कार करने से बालात्कारी का कुछ बिगड़े या न बिगड़े लेकिन इन ख़ास प्रकार के बुध्ध्जिवियों की दिमागी वर्जिश तो हो ही जाती है, मानो बालात्कार या इस प्रकार की कोई दुर्घटना होना इनके लिए एक सुनहरा अवसर लाता है, दिमाग की बत्ती जलाता है,  यदि बालात्कार न हुआ होता तो हम बता नहीं पाते की हमारा धर्म कितना महान है, इसमें सजाये बहुत ही बेहतरीन,स्वादिस्ट, लाजवाब  और उम्दा किस्म है , आज के &#8220;आई एस आई&#8221; मार्क के गारंटी से भी बेहतर. मानो यदि ये धर्म होता तो बालात्कारी के अंग मे चिर काल तक की शिथिलता होती,  हद है भाई  किसी बात की, ये सज्जन लोग पीड़ित से सहानुभूति और संवेदना दिखाने की जगह, इसको सीढ़ी बना अपने &#8220;होली&#8221; प्रोडक्ट का प्रचार करते हैं, कौन जाने कहीं कुछ बिक जाए. मानो कोई दुर्घटना न हो होके, मेला या &#8220;फेस्ट&#8221; का आयोजन हुआ हो, बेच लो जितना बेचना हो, कर लो मार्केटिंग, नहीं टार्गेट पूरा नहीं होगा.</p>
<p style="text-align: justify;">एक भाई साहब ने तो  &#8221;इस्लाम में बालात्कार&#8221; पे  &#8221;दो बाई पांच&#8221;  का पूरा लेख ही लिख डाला जैसे यहाँ हमेशा बालात्कार ही होते हो. खाना &#8211; पीना सोने  की तरह ही बालात्कार भी एक जीवन का एक अभिन्न अंग हो. क्योकि जहाँ धुप हो   छाते वहीँ लगाये जाते हैं.  मेरे समझ नहीं आया की ये बड़प्पन बता रहे हैं,  दिनचर्या.</p>
<p style="text-align: justify;"> मैंने एक मित्र &#8220;जेब अख्तर&#8221; जी  के लेख में पढ़ा था की बंगला देश में यदि एक किसान की बीवी और मवेशी बीमार पड़ते हैं, तो किसान मवेशी के बचने की दुआ पहले मांगता है। वजह। वहां के बाजारों में एक सेहतमंद मवेशी (गाय, बैल वगैरह) की कीमत १५ से २० हजार रुपए तक होती है। जबकि इसी बाजार में आपको एक औरत महज ५ से १० हजार में मिल जाएगी। इसलिए फायदे का सौदा मवेशी को बचाना ही है। दूसरे अगर किसान की बीवी मर जाती है, तो दोबारा विवाह में उसे दान-दहेज भी मिलता है। जो कि मवेशी के मरने के बाद मुमकिन नहीं है। वही कर्गिस्तान में औरतों का अपहरण कर बलात्कार करना एक सामाजिक रश्म से जादा कुछ नहीं वहां की सरकार भी इस अपराध को मूक रहकर सहमती देती है, यदि कोई कहीं पकड़ा भी गया, तो मामूली जुरमाना भर ही लगता है. इसी तरह एक जगह रूस के पास है चेचेनया, जहाँ विवाह के लिए औरतो का अपहरण या बलात्कार हो जाना बहुत ही आम बात है, कुछ देशों में तो औरतो का बकयादा बाजार लगता है.  और इसी तरह के हालत और भी मुल्को में हैं. <strong>ध्यान देने योग्य बात ये है की इन सभी देशो शरियत है. मैंने पहले भी कहा था हम बेहतर है कहने की बजाय कुछ बेहतर करने की कोशिश कीजिये फिर &#8220;रिलिजन मार्केटिंग&#8221; की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. </strong></p>
<p style="text-align: justify;">कुछ मुसलमान भाई बहनों ने कहा की बालात्कारियो की सजा शरियत के हिसाब से हो, कड़ी से कड़ी, इसमें कोई बुराई भी नहीं, अपराधियों को कड़ी सजा मिलनी ही चाहिए, लेकिन क्या शरियत ये गारंटी भी लेता है की अपराधी को १०० प्रतिशत शुद्ध जहन्नम ही मिलेगा? जैसे &#8220;लक्जरी जन्नत&#8221; दिलाने और &#8220;सौ प्रतिशत शुध्द इश्वर&#8221; दिलाने का लेता है.शरियत का नियम है जैसे को  तैसा या पीड़ित के परिवार के मर्जी के मुताबिक, पीड़ित या उसका परिवार चाहे तो उसे कम कर सकता है.  जो हर तरह से जायज है होना भी चाहिए ताकि अपराधियों में खौफ  हो की जो उसने पीड़ित के साथ किया है कौन जाने पीड़ित उससे भी बुरी सजा मुकर्रर करे, लेकिन यही जैसे को तैसा या पीड़ित के मर्जी के हिसाब से महाभारत में भी उल्लेख है जब द्रोपदी ने अपनी इक्षा से दुशाशन को दंड देने का संकल्प लिया था. खैर ये तो रहा एक &#8220;रिलिजन मार्केटिंग&#8221; की पालिसी.</p>
<p style="text-align: justify;">एक तरफ तो युवावों का एक हुजूम संवेदना, दुःख और विरोध प्रकट करने कही पर लाठिया और पानी की बौक्षारे खा रहा हैं. और ये युवा किसी संगठन से नहीं,किसी धर्म विशेष से नहीं, किसी  सवर्ण या दलित जात से नहीं, न ही किसी राजनितिक प्रेरणा से, वरन ये सिर्फ युवा हैं जो अपना आक्रोश प्रकट रहे है, वहां कोई किसी से नहीं पूछ रहा तुम किस जात से हो? किस धर्म से हो?  जिसको दबाने के लिए सरकार की तमाम धाराएं भी नाकाफी है, ये वही युवा है जिनको हम &#8220;माल्स&#8221; &#8220;मल्टीप्लेक्स&#8221; में आनंद  मानाने वाला या पार्को में आमोद प्रमोद करने वाला &#8220;कूल द्युड्स&#8221; कहते हैं.आज इन युवावो ने ये बता दिया है की<strong>&#8220;कूल द्युड्स&#8221; आनंद मानाने </strong><strong>के लिए ही नहीं बना, बल्कि सामाजिक जेम्मेदारी लेना भी जानता है.</strong><strong> यदि ये सडको पे आ जाए तो सरकार के &#8220;धारा&#8221; को &#8220;पसेरी&#8221; बना सरकार, के मुह पर मार सकता है. </strong>लेकिन जब सरकार बेशर्म हो जाए तो उसपर कुछ भी असर नहीं होता, आज के हालत देखने के बाद तो यही लगा की <strong>इंडियागेट &#8220;लीबिया&#8221; है और सरकार &#8220;गद्दाफी</strong>&#8220;.इस स्थिति में आक्रोश प्रकट करने तक तो ठीक है लेकिन लाठी या बौछार खाना  नहीं क्योकि इनके दिल का दर्द मर चूका है वो आपका दर्द क्या जानेगा? कुछ दिन बाद सब  चुप हो जायेंगे &#8230; बाद में फिर वही सिनेमा वही माल्स . चुनाव के समय फिर इसी सरकार को वोट दे देंगे जो लाठी चार्ज करवा रही है.  क्या फायदा  <strong>इन पर  चोट करनी हो तो इस सिस्टम और सरकार के खिलाफ वोट करो, यदि किसी चीज का हल पानी में भीगना है तो, मछलियान और मगमछ्छ दोनों ही देश के सिरमौर होते, हलाकि की आज देश में मगरमच्छ तो है, लेकिन मच्छलियों को खाने के लिए.  </strong></p>
<p style="text-align: justify;"> नेताओं का ये मिथक टूटना जरुरी है की भीड़ बहुत मासूम होती है,  इनको कुछ पता नहीं होता, इनके मासूमियत को ये कभी भी वोट का शक्ल दे सकतें हैं. इनको ये बताना होगा की हमारी चोट तुम्हारे लिए भगवान् के लाठी की  तरह ही होगी जिसमे कोई आवाज नहीं होती, लाठी के जगह मुहर से काम लो.  चीखने चिल्लाने या हुजूम  जुटाने से सरकार सहम तो सकती है वो भी थोड़ी देर के लिए, लेकिन न्याय नहीं मिल सकता. <strong>यदि इन सब से  कुछ होता तो भेड का भी राज  भारतीय जनता के दिल में होता,  बजाय की संसद और देश के.  इन पर चोट करो, इनके खिलाफ वोट करो. </strong>सरकार द्वारा फेके गए पानी में भीगने से अच्छा है सरकार पर ही पानी फेक के इनकी गर्मी शांत करो. पानी पिने से बेहतर है &#8220;पानी पिलाना&#8221;.</p>
<p style="text-align: justify;">जहाँ एक तरफ धर्म जाती और जात भूल युवा चीख रहा है वहीँ कुछ लोग अटकले लगा रहे हैं, की लड़की दलित थी या सवर्ण, यदि दलित होती तो  शायद इतना चीख  पुकार न मचता. भाई पीड़ित बस पीड़ित होता  है ,क्या  किसी ने उससे  पूछा था क्या ? बहन तुम सवर्ण हो या दलित?  या किसी ने सिक्का उछाल के पता किया था &#8220;हेड&#8221; आया तो सवर्ण, &#8220;तेल&#8221; आया दलित ? क्योकि उस  समय तो वह बोलने की स्थिति में ही नहीं थी. यह तो एक प्रकार जन आक्रोश  है, जो बाल्तकार के हद से ऊपर अत्याचारियों के हैवानियत से उपजा है, क्या  वो जो दरिन्दे थे उस  समय उसकी जात  पूछी होगी ?<strong> क्या उनमे से आधे से जादा दलित थे इसीलिए सवर्ण जान लड़की के साथ  बालात्कार के बाद है हैवानियत की हद कर दी, या एक दलित यदि दलित लड़की का बाल्तकार करे तो तो कुछ डिस्काउंट देगा?  </strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>हद है किसी चीज की क्या सवर्ण जाती में पैदा होने से ही व्यक्ति &#8220;इनबिल्ट&#8221; &#8220;ऑटोमेटिक&#8221; और &#8220;बाई डीफाल्ट&#8221; &#8216;दलित विरोधी&#8217; हो जाता है ?  </strong>आजकल  मई खुद बड़ी शंका में हूँ , दलित  मेरे कई दोस्त हैं जो मुझसे किसी भी मामले में कम नहीं है, और न ही  उनको मई अपने से कम मनाता हूँ , लेकिन पता नहीं क्यों लगता है की यदि उनके  किसी भी गलत बात का विरोध कर दूँ तो मई &#8221; दलित विरोधी&#8221; हो जाता हूँ. मई आजकल शंका में हूँ इन &#8220;तथाकथित&#8221; दलित भाईयों  की गलत बातो का विरोध करू या न करू ? इसको सही या गलत के पैमाने से देखा जायेगा या सवर्ण दलित के ? वैसे मेरी तरह ये भी &#8220;कन्फ्यूज&#8221; है,  या ये कहिये इनमे जो जितना जादा पढ़ा लिखा है वो उतना ही कन्फ्यूज होता जा रहा है. कभी ये बुध्द को सिरमौर बनाते हैं तो कभी &#8220;हरिनाकश्यप&#8221; को अपना पूरखा, यानि बुध्द और हरिनाकश्यप में कोई सम्बन्ध है, क्योकि एक इनमे  पुरखा है और एक अग्रज. <strong> यदि आज के दलित भाईयों का मध्य माना जाय तो स्वर्ग में जरुर बुध्द जी हरिनाकश्यप के पाँव छुते होंगे, बुजुर्ग  जो ठहरे.</strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>ये सब देख, एक खास  मानव जाती को एक ख़ास मानव जाती से मुक्त  कराने वाले अम्बेडकर  जी अपना सर धुनते होंगे की जिस सवर्णों से इनकी मुक्ति दिलाई थी ये उन्ही अनुयायी बन गए, और जिस राक्षस जिंदगी से मुक्ति दिलाने का प्रयत्न किया था उसी को पुरखा बता रहें हैं. </strong></p>
<p style="text-align: justify;">देखने वाली बात ये है की आज का दलित किसी भी मामले में पुराने  शोषण करने वाल ब्राह्मणों से कम नहीं है .पहले ब्राहमण होने मात्र से दलितों का शोषण करते थे, <strong>और आज सवर्ण जाती में पैदा होने मात्र से वह  &#8221;शोषक&#8221;  हो जाता है,  हक छीनने  वाला लुटेरा, और जुल्म करने वाला आततायी हो जाता है,</strong> और अपने आप को  खुलेआम दुर्वचन कहने का लाईसेंस भी दिलवाता है. तो दलित किस तरह से अलग हुए उस  जमाने के ब्राहमणों से ??  कुछ तो खुले आम कहते हैं की हम पुराना बदला ले रहें है,  यानि यदि हम मानते है की जो हुआ वो गलत था, लेकिन ये नहीं, शायद ये यही मानते हैं की जो शोषण हुआ वो सही हुआ, तबभी हमें  मौका मिला, या शोषक होने की राह पर कोई भी अँधा हो जाता है. ?? <strong>मुझे कभी कभी ये शंका होती है कही ये जानबूझकर  तो  शोषित नहीं हुए फिक्स डिपोजिट की तरह की बाद  भविष्य में वसूल के साथ बदला लेंगे</strong>. क्योकि इने से अधिकतर  की बातों से  बराबर के अधिकार और हक़ की बाते कम, और  इतिहास को  इंगित कर बदला लेने की बाते जादा कही जाती है. इस प्रकार के दलित (?) बुध्दजीवी  किसी भी प्रकार से पुराने जमाने के ब्राह्मणों से कमतर नहीं मान सकते है, क्योकि विद्वेष ये भी फैलाते हैं .</p>
<p style="text-align: justify;">एक बात और गौर करने लायक है,<strong> जिन ब्राह्मणों  को मंदिरों का ठेकेदार बता कर एक सूत्रीय &#8220;कोसो कार्यक्रम&#8221; आयोजन होता है वही दूसरी तरफ उसी मंदिर से सम्बन्धित अन्य व्यवसायियों को बाईज्जत बरी बस इसलिए कर दिया जाता हैं क्योकि वो ब्राहमण नहीं है, शायद वहां भी दलित एक्ट काम करता हो</strong> . देश में  किसी भी मंदिर में चले जाओ,  ब्राह्मण १०० , या २०० मांगे तो उसको आधा दो तो जादा बकझक नहीं करता क्योकि और भी ग्राहक सम्हाल्नाने है, भीड़ जादा होती है. वही दूसरी तरफ मुंडन करने वाले नाई  को आप एक रुपया कम दें तो  वो गुस्से से आग बबूला हो जाताहै मानो बाल के बाद आपकी गर्दन तक कलम कर देगा.   उसी मंदिर में नाई होता है, उसी मंदिर में कहार भी होता है, एवं अन्य  गैर ब्राहमण लोग भी होते हैं जो मलाई बराबर खाते हैं लेकिन गाली तो सिर्फ ब्राहमण ही सुनेगा. कई गैर ब्राह्मणों को तो मैंने ब्रह्मणों के लिए एजेंटी तक करते देखा है, ख़ुशी ख़ुशी, बाद में आधा आधा. और ये मई हवाई  बाते नहीं बल्कि इसको दलित और सवर्ण दोनों ने महसूस किया होगा, यदि नहीं किया है तो अब से जब भी जाएँ गौर करें.</p>
<p style="text-align: justify;">वास्तव में जाती पाती का स्थान ब्राह्मणों ने क्यों बनाया कैसे बनाया पता नहीं, न ही मई इसमें जाने की जरूरत समझाता हौं , लेंकिन इसका बस एक ही पहलू है, एसा भी नहीं  है . <strong>पुराने जमाने में चमड़े के व्यवसायी को उसके  जाती की संज्ञा दी गयी, यहाँ वह विशेष वर्ग फेल हो गया, दलित हो गया,  जाती के आधार पर नहीं बल्कि &#8220;मैनेजमेंट &#8221; में, आज वही जब  सवर्ण  १००रुपये का चमडा उतार उसकी ब्रांडिग कर  १००० से १० हजार में बेचता है तो  जूते का उद्योगपति कहलाता है. अब किसने कहा था की आप एसा न करो.</strong> अब सोचिये जिस बाल्मीकि जयंती को दलित भाई मानते हैं उसी की किताब को ये मैनेज नहीं कर सके और यदि ब्राह्मणों ने इसे मैनेज  कर  व्यवसाय बना लिया ? वो जमाना आज की तरह आधुनिक तो नहीं था, लेकिन जहाँ चाह वहां राह. आज आपको कौन  रोकता है ? न उस समय कोई रोकता था, तो आपने सहा और यहि है आपका सबसे बड़ा गुनाह. मतला ये है, की इंसान किसी भी जाती में पूज्य हो सकता है, जाती कोई बहुत बड़ी चीज नहीं है, भीम राव अम्बेडकर का जिसने भी उनका विरोध किया उसने मुह की खाई. वो  किसी जाती के मोहताज नहीं थे.  न तो द्रोणाचार्य ठीक था जिसने जाती पाती के आधार पर एकलव्य का अंगूठा काट डाला न ही, न ही दलित के  आड़ में हत्याए करने वाला आज  के बीसियों  गिरोह.</p>
<p style="text-align: justify;"> जब भी कोई किसी दुर्घटना में पीड़ित होता है  तो दर्द सबको होता है,  न की सवर्ण,  दलित, हिन्दू मुसलमान धर्म या मजहब देख के .</p>
<p style="text-align: justify;">सादर</p>
<p style="text-align: justify;">कमल कुमार सिंह</p>
<p style="text-align: justify;">२३  / दिसम्बर / २०१२</p>
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		<title>ये मोदी नहीं, जनता जीती.</title>
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		<pubDate>Thu, 20 Dec 2012 09:37:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>kamal</dc:creator>
				<category><![CDATA[Social]]></category>
		<category><![CDATA[कमल कुमार सिंह]]></category>
		<category><![CDATA[kamal kumar singh]]></category>
		<category><![CDATA[narendra modi]]></category>
		<category><![CDATA[politics]]></category>

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		<description><![CDATA[तमाम कयास बयानबाजी को धता बता आखिर मोदी जीत ही गए. गुजरात में विपक्षी और  देश में विपत्ति हो चुकी कोंग्रेस के दिन अब जल्द ही लदेंगे ये जनता ने दिखा दिया है.  बाप भले ही अपने बेटी से कितना भी प्यार करे लेकिन लेकिन उसको ले जाने वाला दूल्हा ही होता है, लेकिन कोंग्रेसी [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: justify;"><a href="http://kamalkumarsingh.com/wp-content/uploads/2012/12/Narendra-Modi-295x200_mo3.jpg"><img class="aligncenter size-full wp-image-165" title="Narendra-Modi-295x200_mo3" src="http://kamalkumarsingh.com/wp-content/uploads/2012/12/Narendra-Modi-295x200_mo3.jpg" alt="" width="295" height="200" /></a></div>
<p style="text-align: justify;">तमाम कयास बयानबाजी को धता बता आखिर मोदी जीत ही गए. गुजरात में विपक्षी और  देश में विपत्ति हो चुकी कोंग्रेस के दिन अब जल्द ही लदेंगे ये जनता ने दिखा दिया है.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<div>
<p style="text-align: justify;"> बाप भले ही अपने बेटी से कितना भी प्यार करे लेकिन लेकिन उसको ले जाने वाला दूल्हा ही होता है, लेकिन कोंग्रेसी बाप कुछ उन  निकृष्ट बापों में से है जो अपनी ही बेटी का सौदा करने से नहीं चुकते, ये बात कोंग्रेस ने समय समय पर खुद अपने कृत्यों द्वारा सिध्ध किया है. जो भी इनके कंधो पर अपना दारोमदार डालता है, ये उसी पर विप्पतियों का पहाड़ डाल मानो ये जताने की कोशिश करते है की तुमने हमें जेम्मेदारियां दी और हमने तुम्हे विपत्तियाँ, लो हिसाब बराबर.असम में जिन मुसलमानों ने इन्हें अपना मसीहा बनाया, वहां इतना खून खराबा हुआ जो आने वाले समय में एक इतिहास रहेगा. समय समय पर इनके सहयोगी दल सपा और अन्य भी कुछ एसा ही करते दीखाई देते हैं. जिस स्वदेशी के लिए गाँधी जी विदेशी कपड़ो की होली जलवाई  उन्ही के अगुवाओं का  विदेशी प्रेम देखते ही बनता है, चाहे वो व्यापार हो या अध्यक्षा.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">कोंग्रेस के जबरजस्त नकारत्मक प्रचार भी मोदी को  जनता से दूर तो क्या बल्कि हिला भी नहीं पाया. गुजरात ने तय कर लिया की मौत का सौदागर जो रोटी दे वो उन अमनवालों से लाख गुना बेहतर है जो रोटी छीनते है.</p>
<p style="text-align: justify;">गुजरात ने ये  दिखा दिया की सबकी बाप बनने वाली कोंग्रेस का गुजरात पे कोई जोर नहीं, गुजरात मोदी से  प्यार से करती है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>कोंग्रेस का यह कहना हास्यद्पद ही की  हम खुश है क्योकि मोदी उस बहुमत से नहीं जीत रहे जिसकी आशंका थी, ये कुछ वैसा ही लगता है जैसे कोई कहे की हम ताकतवर हैं क्योकि वो हमें लात घूंसों, डंडे, छड़ी से मारने वाला था, लेकिन बस एक लात ही लगाई.   </strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">अब देखना ये है की भारत की जनता मोदी से कितना प्यार करती है. युवावों  और बुजुर्गो दोनों में ही मोदी की लोकप्रियता अब गुजरात की सीमाए तोड़ लगभग हर प्रदेश में बह चली हैं पुरे देश का बहुमत यही  चाहता है की मोदी प्रधान मंत्री बने, लेकिन क्यों ? क्या कारन है मोदी के आगे सभी नेता बौने हो  चुके हैं चाहे वो पक्ष के हों या विपक्ष के ?  क्या कारन है की कोंग्रेस के साम्प्रदायिक कुटिल चालो से भारत की जनता अब और  क्यों नहीं प्रभावित होगी ?  इस कई कारन है, बकवास की जगह विकास सबसे अहम् मुद्दा है जो मोदी ने कर दिखाया, कोंग्रेस के दांत हाथी के हैं ये पूरा देश देख रहा है. <strong>पुरे कई सालो तक कोई काम न करने वाली कोंग्रेस चुनाव  पास देखते ही डेल्ही में ६०० रूपये सीधे सबके अकाउंट में डाल, वोट के  खरीद फरोख्त को लोकतान्त्रिक बनाने का  तरीका जनता देख भी रही  है और समझ भी रही है.</strong> जनता भी कोंग्रेस को कोंग्रेस के कुटिल चालो से ही जवाब देगी, पैसा भी ले लेगी और वोट भी नहीं देगी, और इसलिए लिए कह रहा हूँ क्योकि ये बाते मैंने बहुतों के मुह से सुनी है. गुजरात चुनाव के दौरान कोंगेस के अध्यक्षा सोनिया जीका ये कहना की इंदिरा जी यहाँ  आयीं थी और आपने उनको वोट दिया और हम उनकी बहु हैं यहाँ आई हैं, हमें भी वोट दें, बड़ा ही हास्याद्पद  और राजनातिक अदुर्दार्शिता ही दिखाती है. इनके कहने का मतलब ये की देश की जनता कई सालो तक कोंग्रेस की गुलाम रही है और आज भी रहिये.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">इन सब के विपरीत मोदी ने सिर्फ और सिर्फ  विकास को मुदा ही नहीं बनाया बल्कि उसको क्रियान्वित कर पुरे देश के लिए गुजरात को रोल माडल बनाया. मोदी ने अपने राज में कभी हिन्दू मुस्लिम की बाते नहीं की कही बल्कि हमेशा ६ करोड़ गुजरातियों की बाते कर हमेशा सबका दिल जीता. इसके विपरीत प्रधान मंत्री जी का ये कहना की देश के संसाधनों पर पहला हक़ अल्पसंख्यको का है, एक तरफा  साम्प्रदायिक सोच के अलावा  कुछ नहीं दिखाता और ये बात अल्पसंख्यक समुदाय भी बेहतरी के साथ समझता है, दिखाने को लोलीपोप खिलाने को नफरत का जहर. <strong>जाती पाती  और धर्म को परे रखना भी मोदी की जीत में एक बहुत बड़ी भूमिका बनाते हैं. चुनाव से पहले कुछ धार्मिक  संगठनो का  लालच स्वीकार न कर उन्होंने ये साबित कर दिया की चुनाव धर्म और साम्रदायिकता के आधार पर नहीं बल्कि कार्य से जीते जाते हैं. बहुसंख्यक जनता ने बहुत ही सूझ बुझ का परिचय दिया है और ये बता दिया है. </strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">मोदी की जीत से राजीनीतिक गलियारे में फिर से सुगबुगाहट जागेगी. अब देखना ये है की गुजरात के लिए बडबोली कोंग्रेस का मुह तो देखने लायक होगा ही हालकी इतने बडबोलेपण के बाद शायद ही उसको दिखाना चाहिए लेकिन फिर भी मान लेना चाहिए की बेशर्मता की हद को पार कर दिखाती भी है, जिसके लिए वो जानी जाती है तो चेहरा कैसा होगा ? साथ ही भाजपा के सीने में जादा दर्द होगा. भाजपा चाहती तो थी की मोदी जीते लेकिन  इसके साथ की उन्हें प्रधानमन्त्री पद की उम्मेदवारी से वंचित रखा जाये. यानी एक उस पुरुष की तरह जो किसी महिला को उसकी खूबसूरती और व्यक्तित्व से  प्यार तो करता है लेकिन अधिकार नहीं देना चाहता, बल्कि इस्तमाल कर संतावना देने की फिराक में है. लेकिन भाजपा को यह समझना चाहिए की उसके हिंदुत्व के एजेंडे में अब कोई दम नहीं है, बल्कि मोदी मैजिक है भाजपा को आगे ले जा सकती है. मोदी ही वह मैजिक है जो हिंदुत्व का ध्यान रखने के साथ मुसलमान, पारसी और अन्य धर्मो को उनको पूरा हुकुक, इज्जत दे सकती  है, न का भाजपा का थोथा चना बाजे घना.भाजपा को मोदी का प्रधानमन्त्री पद से दरकिनार करना भाजपा को निश्चित ही भारी पड़ेगा क्योकि मोदी जितना मजबूत कन्धा भाजपा के किसी नेता का नहीं जिस पर  पर वह अपना चुनावी  बन्दुक रख विपक्षी को निशाना बना सके.</p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;"><strong>मोदी जी को बधाई, भाजपा को नसीहत, और कोंग्रेस को मेरी तरफ से गुजरात के लिए हार्दिक श्र्न्धांजलि और संतावना. </strong></p>
<p style="text-align: justify;">
<p style="text-align: justify;">सादर</p>
<p style="text-align: justify;">कमल कुमार सिंह</p>
<p style="text-align: justify;">२० दिसम्बर २०१२</p>
</div>
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		<title>प्रगतिवादी मुस्लिम की व्यथा</title>
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		<pubDate>Tue, 11 Dec 2012 09:42:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>kamal</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[कमल कुमार सिंह]]></category>
		<category><![CDATA[kamal kumar singh]]></category>

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		<description><![CDATA[कट्टरता से भला भी हो सकता है बुरा भी, यदि कट्टरता सकारत्मक हो तो परिवेश बदल सकता है, नकारात्मक  हो तो विध्वंशक हो जाता है. बाबरी मस्जिद काण्ड नकारत्मक कट्टरता का ही एक नमूना है, उसका इतिहास चाहे जो भी रहा हो, भले ही वह हमारे धर्म से सम्बन्धित न रहा हो, लेकिन फिर भी [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://kamalkumarsingh.com/wp-content/uploads/2012/12/kuran-12.jpg"><img class="aligncenter size-full wp-image-156" title="kuran-12" src="http://kamalkumarsingh.com/wp-content/uploads/2012/12/kuran-12.jpg" alt="" /></a></p>
<div style="text-align: justify;">कट्टरता से भला भी हो सकता है बुरा भी, यदि कट्टरता सकारत्मक हो तो परिवेश बदल सकता है, नकारात्मक  हो तो विध्वंशक हो जाता है.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">बाबरी मस्जिद काण्ड नकारत्मक कट्टरता का ही एक नमूना है, उसका इतिहास चाहे जो भी रहा हो, भले ही वह हमारे धर्म से सम्बन्धित न रहा हो, लेकिन फिर भी वह हमारी धरोहर है, क्योकि भारत में है, हमारे देश में है और हिन्दू मुसलमान सबका है. लेकिन इसी तर्ज पे कट्टरवादी मुसलमान चार हाथ और आगे है, हाल में ही शांति के प्रतिक बुध्ध्द जी की प्रतिमा का लखनऊ में तोड़े जाना इसी  बात का प्रतिक है, मुसलमान दशको पहले बाबरी का रोना तो रोते हैं लेकिन ठीक वही काम वो आजतक करते आ रहे हैं.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">इन सब के पीछे क्या कारण है ? कुरआन ? क्योकि मुल्ले (मुसलमान नहीं ) हर बात पे ईश्वरीय वाणी का हवाला दे हर बात पे बरगलाते हैं. ये हर मुसलमान के मन में भर दिया जाता है की कुरआन ईश्वरीय वाणी है. सारी जड बस यहीं से शुरू होती है.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">जिस समय कुरआन की रचना हुयी उसका उद्देश्य बड़ा स्पष्ट था, मानव जाती को सुधारना न की बिगड़ना. इसी सोच के साथ उन्होंने कुरआन की रचना की. उन दिनों अरब में शिखर तक लुट मार और पापाचार फैला हुआ था, औरतो का बिकना, हत्या, लूटमार, वहां का लोकाचार था. जिससे मोहम्मद दुखी रहा करते थे, शायद  वो एक सदात्मा थे .. तब उन्होंने अरब वासियों को सुधारने के लिए कुरआन लिखा (लिखवाया).</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">और अपने विचारो से सबको अवगत करने की सोची.लेकिन बदलाव किसको पसंद है ? लोगो ने विरोध किया, यहाँ तक की लोग मोहम्मद के दुश्मन भी हो गए, मोहम्मद भागे भागेफिरने लगे, फिर उन्हें एक उपाय सुझा, क्यों न इश्वर  का सहारा ले कर इनको इंसान बनाया जाए, कहते हैं न की हिम्मते मरदा मददे खुदा, फिर उन्होंने अपनी बातो को इश्वर वाणी बताई ताकि कम से लोग उनको सुने, यदि  मन मात्र के भले के लिए कोई झूठ बोले तो उसे पाप नहीं माना जा सकता.जिससे लोगो में बदलाव हुआ, लोग रस्ते पे आना शुरू हुए. उनको ये नहीं पता था की  मानव इतना नीच है की उनके जाने के बाद कालांतर में ये मानव अपने कुकर्मो का बिल भी उन्ही के नाम पे फाडेगा. बाद में स्वार्थी मुल्ले मौलवी मोहमद के नाम पर ही उल जलूल व्याख्या कर लोगो को कट्टर बनाने का काम शुरू किया सिर्फ अपने फायदे के लिए, बिना ये समझे की मोहम्मद ने इसको इश वाणी का नाम क्यों दिया. किसी भी चीज के दो पहलू होते है, इश्वर के नाम पे सुधार की शुरुवात मोहम्मद ने  की और बिगाड़ की शुरुवात इनके स्वार्थी अनुयायियों ने.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">कुरआन पढ़ने से स्पष्ट मालूम पड़ता  है की वो सिर्फ अरब वासियों को ध्यान में रख कर बनाया गया था. अब आप ही सोचिये यदि कुरआन भगवान्/परमेश्वर का होता तो सिर्फ अरब आधारित क्यों लिखा जता ?? सारे तथ्यों का आधार अरब ही क्यों होता ? या तो उसमे पूरी दुनिया के बन्दों को मुसलमान मानना चाहिए क्योकि इश्वर ने सारे दुनिया के हर इंसान, जीव को बनाया है.  लेकिन उसमे गैर मुसलमान का जिक्र क्यों ?? क्या बाकी भगवान् के पुत्र/या उनके बनाये नहीं है ? क्या इश्वर कभी ये कह सकता है की तुम मेरे बेटे हो और वो नहीं ? क्या इश्वर भी धर्मांध हो सकता है. हाँ  चाहे तो वो ये कह सकता था की अच्छा मुसलमान और बुरा मुसलमान, बुरे मुसलमान अपने पे ईमान लाये, न की इश्वर &#8220;गैर मुसलमान&#8221; शब्द का प्रयोग करता. क्या इश्वर मानव को दो भागो में विभक्त करना चाहता था ?  भाई धर्म अच्छी चीज है, उसका उपयोग गलत और सही हो सकता है. धरम ग्रन्थ हमारे लिए हैं हम धर्म ग्रंथो के लिए नहीं,  ठीक वैसे ही जैसे ताला चाभी घर के लिए बनाया जाता है, किसी घर को ताला चाभी के लिए नहीं बनाया जाता, क्योकि यदि हम धर्म के नाम पर धर्मांध हो गए तो हमारा फायदा, मुल्ले/पंडित/ पादरी और इन सबके पिता जी &#8211; नेता लोग उठा ले जाते है..और हमारे दिमाग में भी ये बाते बस इसीलिए भरी जाती है की हम इनके लगाम में रहे है.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">कालांतर में कुरआन में गुपचुप तरीके से न जाने कितने बदलाव हुए लेकिन ये बाहर नहीं आने दिया जाता की हमने कुछ बदलाव किया है, वो बदलाव नकारात्मक है.इन मुल्लो की परेशानी ये थी कुरआन को पूरी तरह से बदल भी नहीं सकते थे, क्योकि कुरआन आते ही कुछ अच्छे आलिम लोगो के हाथ में भी पहुची, वो इन मुल्लो का पोल खोल देते, इसलिए इन मुल्लो ने बड़े सुनियोजित ढंग से कुरआन में चुपके चुपके बदलाव किया. कई पीदियो तक&#8230;. मेरी बात की सत्यता जाचना चाहते हैं तो कुरआन की ही कई लेखको द्वारा टीका पढ़िए, सबने अपने अपने हिसाब से टिका  लिखा है. ये हाल सिर्फ कुरआन के साथ ही नहीं बाकी सारे धर्म ग्रंथो के साथ भी है . तो जब बदलाव हो ही रहा है तो सकारत्मक क्यों न हो. क्यों हम इश्वर के पाँव में जंजीर जंजीर बाध् उनको भी अपने बुरे कामो में घसीटते रहे ?</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">कुरआन बस एक साहित्य है, किसी के अपने निजी विचार, जो मानव मात्र के भलाई के लिए बनायीं गयी और असरदार ढंग से काम करे इसलिए इश्वर का सहारा लिया गया. इससे जादा और कुछ नहीं ये कोई इश्वर की किताब नहीं. अब मुसलमान भाई कहते हैं, की कुरआन जैसी एक आयत लाओ जो &#8220;डिफरेंट&#8221; हो. भाई हर लेखक  अपना विचार होता है. अब मई ये कहूँ की तुम प्रेमचंद्र जैसी जैसे कोई एक कहानी लाओ, बिलकुल डिफरेंट, माने लोचा , कुरआन जैसी भी हो और डिफरेंट भी हो. अजब दिल्लगी है भाई.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">फिर कहते हैं हिन्दू को धर्म नहीं, रामायण या गीता में कहीं भी इस शब्द का कोई उपयोग नहीं. बिलकुल सत्य वचन. हमारे परिवेश के कारन  हमें हिन्दू कहा गया. और रामायण और गीता में हिन्दू या किसी धर्म का नाम न होना ही उसका बड़प्पन है. क्योकि ये साहित्य मानव मात्र के कल्याण  के लिए है न की किसी विशेष धर्म या समुदाय के लिए.और इसके विपरीत कुरआन में मुसलमान का जिक्र आया है क्योकि उस जगह की परिस्थितिया और अरब जगह मुसलमान ही थे. मोहम्मद साहब ने बस इस शब्द का उपयोग न कर &#8220;बुरे&#8221; या &#8220;अच्छा&#8221;  मानव का शब्द इजाद किया होता तो शायद ही आज कोई वैमनस्यता होती. मुसलमान भाई भी कहते है की कुरआन किसी धर्म या समुदाय के लिए नहीं, बजाय इसके की यही सबसे उच्च धर्म है,और मुसलमान सबसे बेहतर है.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"> हम बेहतर है&#8221; वाला ऐटीटयूट भी गलत नहीं है, बशर्ते इसी को कर्मो द्वरा पूरा किया जाये बजाय की दुसरे धर्मो और उनके प्रतीक चिन्हों पे आघात करना, जरा सोचिये किसी की भावनावो पे चोट कर क्या आप इश्वर को खुश कर सकते हैं ? जरा सोचिये दुनिया की तस्वीर क्या होगी जब &#8220;हम बेहतर है&#8221; दिखाने के लिए सारे धर्म वाले आपस में सकारात्मक प्रतिस्पर्धा बेहतर से बेहतर कार्य के लिए करे. मुसलमान कहे हम बेहतर है  हमने १० को सहारा दिया, हिन्दू कहे की नहीं भाई हम भी है, हमने भी ५ को सामर्थ्यनुसार तो सहारा दिया है, इसाई कहे की हम ३ का पालन पोषण करते है. बुराई तब आ जाती है जब हम बिना कुछ किये दुसरे को कहने लगते है की तुम खराब हो.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">एक प्रगतिवादी मुसलमान भाई के दिल की कसक ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहा हूँ :-</div>
<div style="text-align: justify;">एक बात जो इस्लाम में बहस का मुद्दा हो सकती है या कहुं की सरे मज़हब का सुधर कर सकती है की क्या कुरआन और शरियत के बहार जाया जा सकता है क्या आज के समय के हिसाब से चला जा सकता है , तो में यही कहूँगा ( चाहे इसके बाद मेरे खिलाफ फतवों की बारिश भी हो जाये ) हाँ बिलकुल जाना चाहिए , और ये मुहम्मद सल्लालाहू अ.व ने भी कहा था की जब किसी नतीजे पर न जा सको तो अपने दिमाग से काम लेना हो सकता है हर बात का जवाब कुरान या हदीस न दे पाए. एक समय जो इस्लाम का सुनहरा दौर कहा जाता है उस वक्त तब एक शब्द का ज्यादा इस्तेमाल होता था एवं उसे ‘इज्तीहाद कहा जाता था। इस शब्द का अर्थ है स्वतंत्र चिन्तन। व्यवहार में यह शब्द हर आदमी औरत को यह आज़ादी देता था कि वे महजबी सीखों को आज के दौर की कसौटी पर कसें एवं फिर उन पर अमल करें। किन्तु जैसे-जैसे मुस्लिम साम्राज्य स्पेन से बगदाद तक फैला मुफ्तियों ने इस सल्तनत की रक्षा के लिए स्वतंत्र चिन्तन के द्वार बन्द कर दिये। इस तर्क एवं चिन्तन का स्थान फतवों ने ले लिया एवं मुसलमानों को सिखाया गया कि वे खुद सोचने की जगह इन फतवों पर अमल करें। इस्लाम के वर्तमान युग की त्रासदी यही है कि मुसलमान अपने दिमाग में उठने वाले सवालों को खुले में उठाने से डरते हैं एवं मुल्ला मौलवियों द्वारा जो कुछ भी कहा जाता है उस पर अमल करते हैं। और यही सरे फसाद की जड़ है ,</div>
<div style="text-align: justify;">मेरा सभी मुसलमान भाई और बहनों से निवेदन है की ज़रा इस बात पर ज़रूर गौर करें.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">अगर हम अपने उलेमा, राजनीतिज्ञों एवं मुल्लावों की तकरीरों को सुने तो वे हमेशा पश्चिमी सभ्यता के खोट गिनाते दिखेंगे किन्तु वही मुल्ला एवं पालिटीशियन अपने बच्चों को अमेरिका के स्कूल एवं कॉलेजों में दाखिले के लिए जमीन आसमान एक किये रहते हैं। तमाम अमीर मुसलमान परिवार पश्चिम में छुट्टियाँ मनाते नजर आते हैं। यहाँ तक कि धन से भरपूर खाड़ी के देशों में भी वहाँ की अवाम अपने को सोने के पिंजरे में बन्द महसूस करती है। आखिर क्या वजह है कि इस्लाम रचनात्मकता, नई सोच और मानवाधिकारों का गला घोटने वाला मजहब बन गया है। पाकिस्तान १९४७ में वजूद में आया था लेकिन एक साल बाद जन्म लेने वाले इजराइल से कहीं पीछे रह गया है।इस्लाम के पिछड़ेपन की एक बड़ी वजह यह भी है कि इस मजहब का जन्म अरब में हुआ जहाँ घुमन्तु रेगिस्तानी कबीले रहा करते थे। कबीलों की एक विशेष संस्कृति होती है। उनका अस्तित्व किसी शेख का हुकुम मानने पर निर्भर करता है। वहाँ मर्द राज करता है एवं औरत की कोई अहमियत नहीं होती।</div>
<div style="text-align: justify;">आज भी अरब लोग खुद को असली मुसलमान और बाकी इस्लामी दुनिया को धर्मान्तरित मुसलमान समझते हैं। बाकी दुनिया के मुसलमान भी इसी अरबी मानसिकता को पालने एवं रीति रिवाजों की नकल करना चाहते हैं। मांजी का मत है कि मुस्लिम जगत पर औरतों की यह पकड़ दुनिया का सबसे बड़ा उपनिवेशवाद है। इक्कीसवीं सदी में जरूरत इस बात की है कि दुनिया के बाकी मुसलमान अरबों की इस कबीलाई सोच एवं रीति रिवाजों से छुटकारा पायें।</div>
<div style="text-align: justify;">आप अरबी मुसलमान नहीं हैं आप हिन्दुस्तानी मुसलमान हैं और हमको चाहिए की जो रिवाज हमारे हैं अगर हम गोर करें तो कहीं भी इस्लाम के खिलाफ नहीं हैं बल्कि अरब मुल्कों से कहीं ज्यादा बेहतर हमारे मुल्क के रिवाज हैं हमको खुद को अपने मज़हबी दायरे में रहकर खुद में बदलाव लाना चाहिए जो आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है.</div>
<div style="text-align: justify;">अगर किसी को मेरी बात से दुःख या टेस लगे तो माफ़ करना लेकिन हकीकत से मुहं छुपाना कायरता होती है.</div>
<div style="text-align: justify;"><strong>सम्बंधित लेख (क्लिक करें)</strong>  :- <a href="http://kalyugeenarad.blogspot.in/2012/10/blog-post_27.html" target="_blank">ये जाहिल है, मुसलमान नहीं</a></div>
<div style="text-align: justify;">                               <a href="http://kalyugeenarad.blogspot.in/2012/09/blog-post_19.html" target="_blank">इनोसेंस आफ मुस्लिम्स, बिना बॉक्स आफिस के बड़ी हिट</a></div>
<div style="text-align: justify;">सादर</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">कमल कुमार सिंह</div>
<div style="text-align: justify;">२७ नवम्बर २०१२</div>
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		<title>सत्ता ब्यूटी पार्लर है</title>
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		<pubDate>Tue, 11 Dec 2012 09:39:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>kamal</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[कमल कुमार सिंह]]></category>
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		<description><![CDATA[आयरलैंड में एक प्रसिध्द व्यक्ति  और लेखक हुआ, जार्ज बनार्ड शा,  वह &#8220;लन्दन स्कुल आफ इकोनोमिक्स&#8221; के संस्थापको में से एक था.वह इंग्लैंड के साम्राज्यवाद निति से बड़ा दुखी रहता था, वह इंग्लैंड &#8220;कु-निति &#8220;का आलोचक था. उसका कहना था  इंग्लैंड वाले बनाने में बड़े निपुण हैं, सामान और लोगो को भी. नया सामान जब [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://kamalkumarsingh.com/wp-content/uploads/2012/12/download-1.jpg"><img class="aligncenter size-full wp-image-153" title="download (1)" src="http://kamalkumarsingh.com/wp-content/uploads/2012/12/download-1.jpg" alt="" width="120" height="90" /></a></p>
<p style="text-align: justify;">आयरलैंड में एक प्रसिध्द व्यक्ति  और लेखक हुआ, जार्ज बनार्ड शा,  वह &#8220;लन्दन स्कुल आफ इकोनोमिक्स&#8221; के संस्थापको में से एक था.वह इंग्लैंड के साम्राज्यवाद निति से बड़ा दुखी रहता था, वह इंग्लैंड &#8220;कु-निति &#8220;का आलोचक था. उसका कहना था  इंग्लैंड वाले बनाने में बड़े निपुण हैं, सामान और लोगो को भी. नया सामान जब खपत न होता तो इंग्लैंड वाले अपने पादरी दुसरे देशो में भेज देते, बाद में उस देश में पादरियों पे उत्पीड़नका आरोप लगा जहाजो में अपने सैनिक भेज उसपे कब्ज़ा जमा अपना नया बाजार  तैयार कर लेते.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>पादरी, इश्वर ही नहीं बल्कि नया बाजार भी उपलब्ध करवाता है</strong>. सन १६०० के आस पास उसने भारत के लिए भी यही रननिति  अपनाई. १९४७ में आजादी के बाद उसके सीने पे सांप लोटने लगा, क्योकि यहाँ स्वदेशी की आग लग गयी थी. वह दुखी था क्योकि वह दयालु है, <strong>परमेश्वर और बाजार का &#8220;कम्बो पैक&#8221;</strong> सदाचार में  मुफ्त में उपलब्ध करवाता है.</p>
<p style="text-align: justify;"><strong>स्वदेशी ज्वाला में कही भारत जनता कहीं जल न जाएँ यह सोच के इंग्लैण्ड की आँखों में आंसू आने लगे</strong>. उसने अपनी रणनीति बदली अबकी पादरी न हो के महिलाओं का सहारा लिया गया. उसे पता था भारत में नारियो को माता, देवी शक्ति माना जाता है. नारी को अपनानाने में भारतवासी भी पीछे नहीं है. <strong>भारत ने  लेडी गोगो के गानों से लेकर वस्त्रो के आतंक से मुक्त रहने वाली &#8220;लीयोनी&#8221; जी तक को अपना लिया.</strong> उसने एक महिला को चुनकर भारत के उस समय के शक्तिशाली राजनैतिक परिवार के पुत्र के पास भेजा. उसने शायद भारतीय पुस्तके पढ़ी थी, उसे पता था की अप्सरावों को भेज किसी भी विश्वामित्र का तप भंग किया जा सकता है तो ये तो बस एक भारतीय राजनैतिक पुत्र है, यदि ये अपने झांसे में आ गया तो अपना धन्धा पहले से भी बढ़िया. हुआ भी यही, अंग्रेजी इन्द्र अपने अप्सरा को भारत में भेजने में सफल रहा. <strong>उसने प्रेममय &#8220;हवाले&#8221; से स्त्री को भारत में &#8220;इम्पोर्ट&#8221; किया, आप इसको &#8220;इम्पोज&#8221; भी कह सकते हैं.</strong> वह अप्सरा भारत आई और इस आधुनीक विश्वामित्र से कहा तुमने मुझे भारत लाके इस देश का और यूरोप का भला किया है, अब तुम्हारा काम पूरा हुआ, तुम्हारे जीवन का उद्देश्य सफल हुआ, अब तुम जाओ तुम्हारा काम बस इतना ही था, तुम्हारे इस पुन्य कार्य लिए हमारे पादरियों  ने स्वर्ग में एक स्पेशल &#8221; होलीडे सेल&#8221; का निर्माण किया है. वही मौज मनाओ, यहाँ  का काम हम देख लेंगी, अब आप आराम करो.  और इस देश की जनता का क्या ? वसुधैव कुटुम्बकम सभी अपने है बस अपना उल्लू सीधा होना चाहिए.</p>
<div style="text-align: justify;">सेर भर कबाब हो</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">एक अद्धा शराब हो</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">नूरजहाँ का राज हो</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">ख़ूब हो&#8211;  भले ही ख़राब हो  &#8212;&#8212;- (स्व श्री सुदामा पांडे)</div>
<p style="text-align: justify;">भारत की  नारिन्मोख जनता ने इनको भी स्वीकार कर लिया, भारत के लिए असली  ग्लोबलाईजेशन का दौर यहीं से शुरू हुआ.  <strong>&#8220;वसुधैव  कुटुम्बकम&#8221; का इससे बड़ा नमूना क्या होगा जहा भारतवासी किसी भी देश के नारी को अपना मान लेते हैं, पहले भी उन्होंने अंग्रेजो को अपना भाई माना था, क्या हुआ जो कुछ  हिस्सा ले के भाग लिए, अब भाई है तो जाय्दादा में बटवारा भी होगा ही. ये तो उनका हक़ था. नाहक ही उन्हें लोग विदेशी लुटेरे कहते हैं.   </strong></p>
<p style="text-align: justify;"><strong>सत्ता मिलते ही सत्ताधीन  पहले कई साल तक सत्ता को समझने की कोशिश करता है, क्योकि वह अपने को सत्ता का पति और सत्ता को  अपने हरम की एक बंदी समझता है जिसका कन्यादान  मुर्ख जनता खुद करती है.  शुरुवात में  थोडा प्यार मनुहार करता है, फिर भोगता है,  फिर बांदियो सा व्यवहार करता है, वह भूल जाता  है की जागरूकता के इस समय में दुल्हन भी तलाक ले कहीं और जा सकती है.  अपने कर्म को बताने कुकर्म को छुपाने के लिए लालची &#8220;पड़ोस के देवरों&#8221; को लगा देता है जो जनता को ये बताते है की तुमने ठीक जगह कन्यादान किया वो सुखी है तुम भी खुश रहो.</strong>   देवर भी कैमरा ले के बड़े भईया को नीचा नहीं होने देते. दुल्हन  है भी तो एकदम सीधी भारतीय ब्रांड, एक हद तक सहने को तैयार, सामने वाला  चाहे कितना भी कुकर्मी हो उसे सहना ही पड़ता है, वो बात अलग है को वो सिसकती है, रोतीहै, आजाद होना चाहती है, लेकिन उसे कोई रास्ता दिखाई नहीं देता, अंततोगत्वा वह दुल्हे को तलाक का नोटिस दे इन्तजार करती है. नोटिस मिलने पर &#8220;यह&#8221;  चिंतित होता है. हाय ये क्या हुआ, क्या मेरा अब तलाक हो जायेगा? और यह कहीं और चली जाएगी ?कैसे रह पाउँगा मै इसके बिना ?  हमने सात जन्मो तक साथ जीने मरने की कसम खायी थी, इतनी जल्दी साथ छुट गया तो परमात्मा को क्या मुह दिखलाऊंगा.  नहीं नहीं यह नहीं हो सकता, ये मेरी है सिर्फ मेरी है, मेरे पुरखो ने न जाने कितनो का खून बहा के इसे छीना है, एसे न जाने दूंगा.और &#8220;यह&#8221; मुर्ख &#8220;बाबुल&#8221; से  अपनी मजबूत दावेदारी सीध्ह करने को मजमा करता है , जलसा करता है, सारे  उपक्रम  फिर से करता है.  इनके लिए सत्ता का मतलब बस इतना ही है.</p>
<p style="text-align: justify;">हाल में रामलीला मैदान में हुए एक रैली के <strong>&#8220;त्रिफला चूर्ण&#8221; (माता -पुत्र और चचा)</strong> का भाषण रख रहा हु  जिससे  पता चलता है की ये जनता के हाजमा का कितना ख्याल करते हैं.  नेतावों की जनसेवा का अमरत्व भाव पता चलता है :-<br />
जिसको आधी रोटी मिलती है वो पूरी खायेगा, जो आधा पेट खाता है वो पूरा पेट खायेगा, (भाई बिना सत्ता के मै भी आधा था, पहले अपना पूरा करूँ, पहले मै खाऊ, आखिर मै भी जनता हूँ. मै ठीक रहूँगा तो आप लोगो की भी सेवा होगी).<br />
भारत एक बार फिर से खड़ा होगा पूरी दुनिया उसको एक बार फिर पहचानेगी, (यानि अभी तक ६० सालो में हमने उसे लंगड़ा कर रखा है, ताकि पहले हम खड़े हो सके, हम अपनी पहचान बना लें फेर बाकी का भी हो जायेगा).<br />
मै बहुत आभारी हूँ आप दूर दूर आधे पेट हमारी रैली में आये आशा है आगे भी आधे पेट या खाली पेट अपनी हालत की परवाह किये बगैर हमारी रैली में आ देश को तरक्की के रास्ते पे ले जायेंगे. हमारी रैलियों में आईये  हमारे भाषण को सुनिए, आधा पेट तो आप वैसे ही भर जायेगा.</p>
<p style="text-align: justify;">हमने इस देश में इन्फ्रास्टकचर पे ख़ास ध्यान दिया है आदर्श जैसी बिल्डिंगे बनायीं है जिससे जनता और नेता दोनों का पेट भरा है, बिल्डिंग देखिये और पेट भरिये, इतने पर भी खाली रहे तो हमारा क्या दोष ?  भ्रष्टाचारियों को दंड मिलेगा वो बात अलग है की हम उस दायरे में अपने आपको नहीं लायेंगे, हम अगर इन कानूनी लफडो में पद गए तो देश की तरक्की कौन करेगा ?..<br />
हमारी पार्टी पर तरह तरह के आरोप लगाए जा रहे है, उसमे सच क्या है , झूठ क्या है , ये आपके विवेक पे निर्भर करता है , लेकिन एक बात आपको समझना होगा की जो शाशन में होता है वही सत्य है , वही शाश्वत है, नहीं तो है सत्ता की ताकत से बना लेंगे आप चिंता न करे आप बस सच के साथ रहें, बाकी आपके विवेक पे निर्भर है.<br />
हमने ही सुचना का अधिकार लाया है, जिसके तहत कोई भी जानकारी आप ले सकते हैं, बशर्ते सरकार के भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में न हो, हम पैदायशी साफ़ पाक है, <strong>और आपको भी &#8220;साफ़&#8221; कर के रहेंगे</strong>.<br />
हमारे विरोधी हमारे बारे में उलटी बाते करते रहें, लेकिन हम उनके बारे में कोई उलटी बात नहीं कहेंगे<strong> (क्योकि हम करने में विश्वाश रखते हैं) </strong>तभी एक लोकल महिला उठती है. अपना भाषण पद्धति है और साथ वाले नेतावों को &#8220;माननीय&#8221;, &#8220;सम्माननीय&#8221; जैसे प्रमाण पत्रों से नवाजती है.</p>
<p style="text-align: justify;">एक नेता को दुसरे नेतावों को  &#8221;आदरनीय&#8221; और  &#8221;सम्मानानीय&#8221; शब्द  से नवाजना एसा लगता है जैसे एसा लगता है <strong>एक चोर दुसरे चोर को बड़े से बड़ा बताना चाहता हो </strong>ताकि उसकी बारी आये तो सामने वाला चोर भी उसे बड़ा बताये. आजादी के बाद जिन नेतावो ने चोरो को पकड़ने के लिए कड़े कानून बनाये आज उसी परिवार या दल के नेता चोरों को सर्टिफाईडी बनाने के कानून बना रहें हैं .<strong>सर्टिफाईडी चोर </strong>यानी जिनके लिए चोरी करना वैध है. इन चोर, डाकुवो को सम्मत बनाने के लिए, जनता के बीच पचाने के लिए त्रिफलाओ की पाचनपूर्ण  रैली का मख्हन से लपेटा &#8220;पाचक भाषण&#8221; परोसा जाता है. जिसको  जनता अभी समझ नहीं पा रही है. शायद जनता का जन्तत्व ख़त्म हो गया है.</p>
<div style="text-align: justify;">&#8221;पता नहीं हम कहां से चल कर, कहां पहुंच कर ठहर गए हैं,</div>
<div style="text-align: justify;">हमारे सीनों पे पांव रखकर, गधों के लश्कर गुजर गए हैं,</div>
<div style="text-align: justify;">हमारी टूटन, तुम्हारे वादे, फना हुए कहां तेरे इरादे</div>
<div style="text-align: justify;">जिन चेहरों पे है निगाह डाली, कई लबादे उतर गए हैं।&#8221;</div>
<p style="text-align: justify;"><strong>नेता अपने चोर, डाकुवों वाले वीभत्स चहरे को छुपाने के लिए सत्ता का ब्यूटीपार्लर की तरह इस्तेमाल कर रहा है. और सत्ता के तंत्र इसके प्रसाधन है(मिडिया वगैरह) जिससे अपने चहरे मोहरे चाल चलन का ट्रिमिंग, फेशियल करा खुबसूरत चेहरा जनता के सामने रख रहा है. सच ही है, सत्ता में बहुत शक्ति है, चुड़ैल को देवी और राक्षस को देवता बना सकती है, लेकिन जनता को जनता के रूप में नहि बल्कि अपने साधन के लिए इस्तमाल कर रही है.</strong></p>
<div style="text-align: justify;">न कोई प्रजा है</div>
<div style="text-align: justify;">न कोई तंत्र है</div>
<div style="text-align: justify;">यह आदमी के खिलाफ़</div>
<div style="text-align: justify;">आदमी का खुला सा</div>
<div style="text-align: justify;">षड़यन्त्र है .&#8212;&#8212;&#8212;(स्व श्री सुदामा पांडे)</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<p style="text-align: justify;">सादर</p>
<p style="text-align: justify;">कमल कुमार सिंह</p>
<p style="text-align: justify;">४ नवम्बर २०१२</p>
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		<title>मोहब्बत और गणित &#8211; विज्ञान</title>
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		<pubDate>Tue, 11 Dec 2012 09:37:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>kamal</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[kamal kumar singh]]></category>

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		<description><![CDATA[शीर्षकाविषय  एक दुसरे के विपरीत हैं,  कहाँ मोहब्बत और कहाँ गणित और विज्ञानं, कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली, लेकिन शायद ही किसी ने कभी ये जानने की कोशिश नहीं किया होगा की क्यों भोज और गंगू को ही चुना गया? क्या वास्तव में विपरीत थे? नहीं हो ही नहीं सकता, असमानता की तुलना कहीं [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://kamalkumarsingh.com/wp-content/uploads/2012/12/images.jpg"><img class="aligncenter size-full wp-image-150" title="images" src="http://kamalkumarsingh.com/wp-content/uploads/2012/12/images.jpg" alt="" width="224" height="225" /></a></p>
<div style="text-align: justify;">शीर्षकाविषय  एक दुसरे के विपरीत हैं,  कहाँ मोहब्बत और कहाँ गणित और विज्ञानं, कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली, लेकिन शायद ही किसी ने कभी ये जानने की कोशिश नहीं किया होगा की क्यों भोज और गंगू को ही चुना गया? क्या वास्तव में विपरीत थे? नहीं हो ही नहीं सकता, असमानता की तुलना कहीं न कहीं समानता होने पर की जा सकती है, नदी के दो पाट भी बिलकुल अलग होते हैं लेकिन दोनों ही नदी के किसी न किसी किनारे को दिशा देने में सहयोग करते हैं. निश्चित ही गंगू तेली के कोल्हू का तेल राजा भोज के रसोई में जाता होगा. गंगू बिचारा दिन भर मेहनत करता होगा, कोल्हू पेरता होगा, और उसके तेल की पकौड़िया भोज भी लपकते होंगे, तभी ये तुलना बनी होगी.</div>
<div style="text-align: justify;">आज भी देखो पार्टी के कार्यकर्ता कितना मेहनत  करते हैं, माला फूल से ले के जनता को वोट देने तक &#8220;फूल&#8221; बनाने की तयारी बिचारे नेतान्मोंत चेला  करते हैं, और उन्मुक्त मजा लेता है विधायक, मंत्री.</div>
<div style="text-align: justify;">शुरुवात के कई साल इस आशा में निकल जाते हैं की अबकी टिकट मिलेगा, तो सब कसर पूरी होगी, कौन जाने नेता जी अबकी हाई कमान से हमारी बात करें, लेकिन इनकी हालत प्रेमी सी हो जाती है जिसका फूल पहुचने वाला हरकारा खुद प्रेमिका उड़ा ;ले जाता है. तब भी चकोर माफिक ( चोर माफिक नहीं ) कभी न कभी गणित सेट  करने की  ताक में रहते हैं. मोहब्बत के गणित में अपने नेतावों को महारथ हासिल है.</div>
<p>कुछ दिन पहले ही गांधीवादी और नैतिकवादी  कोंग्रेस के नेता &#8220;कम&#8221; प्रोफ़ेसर  एक प्रतियोगी को बिना ज्युडिशियल परीक्षा के जज बनाने का गणित समझा रहे थे. हलाकि की  फार्मूला लगा नहीं, जज से पहले प्रोफ़ेसर ही फेल हो गए, नौकरी से ही निकाल्द इया गया. लेकिन बाद में गांधीवादी कोंग्रेसियो को समझ आया की इतने बड़े विद्वान को अपने से दूर रखना ठीक नहीं है, इन्ही जैसे प्रोफेसरों  के उच्च ज्ञान द्वारा निर्मित जज  हमें इन्हें बचाते आयें  हैं.  सो पुनः ज्ञान का प्रकाश फ़ैलाने वापिस बुला लिया है.</p>
<p>वैसे भी नौजवान <strong>(आजकल नैजवान होने का दायरा बढ़ के बुजुर्ग की बाउंड्री के सीमा रेखा तक पहुच गया है, सुना है अबकी बार वाली पञ्चवर्षीय योजना में नौजवानों की पदवी ५० उम्र तक भी की जा सकती है) </strong> बालिकावों  को शोध का विषय मान  न जाने कितने गणित लगा देते हैं, तमाम फार्मूलों का आविष्कार कर डालते हैं, और कही जो डॉक्टरेट मिल गयी तो फिर खर्चे का गणित  लगाते है,  मजे की बात ये की इन फार्मूलो को आगे बढ़ाने की हिम्मत इलाहाबाद के  मेहता रिसर्च वाले भी नहीं करते, घबराते हैं. लेकिन वो गलत करते हैं, उन्हें इस दिशा में भी प्रयास  होना चाहिए, आखिर गणित का रास्ता भी दिल से होकर निकलता है या गणित करने के बाद दिल का रास्ता निकलता है , खैर जो भी हो, लब्बो लुवाब ये है की दोनों  अलग अलग नहीं है.</p>
<div style="text-align: justify;">हरिशंकर परसाई ने अपने एक लेख में एक भ्रम के बारे में लिखा है, लेकिन मै उसको भ्रम नहीं बल्कि मोहब्बत का गणित मानता हूँ. अगला शाम को सूरज को एक टक  देखे जा रहा है, मै सोचता की  वो प्रकृति सौन्दर्य प्रेमी है, लेकिन सूरज डूबते है वो &#8220;लोटा&#8221; ले के बगल वाले नाले में कूद जाता  है, अर्थात सूरज उस समय तक वो मोहब्बत नहीं बल्कि नफरत कर रहा होता  है,<strong> एक तरफ पेट में इतना मरोड़, दूसरा मुआ सूरज की डूबता ही नहीं, जैसे डूबा वैसे सूरज को साधुवाद, उसकी स्थिति उस पुत्र सी होती है जिसका बाप बहुत रुपया जमा कर रखा है, लेकिन मरने में थोड़ी देरी  है.</strong>  उसका पूरा ध्यान &#8220;टाईमिंग&#8221;  का गणित लगाने में होता है की कब ये निपटे और का हमारे दिल में इनके लिए प्यार पैदा हो. क्या करे हम तो इनसे प्यार करना चाहते हैं, इनकी मुर्तिया लगवाना चाहते हैं, जिन्दगी भर इनके गुण गाना चाहते हैं, लेकिन ये हैं की मौका ही नहीं देते, तो इसमें हमारा क्या कुसूर. इनको निपटने दीजिये देखिये हम इनका कितना आदर सत्कार करते है, इनकी याद में जश्न मनाएंगे, तेरह दिन बाद भोज रखवायेंगे, इनके जाने के बाद ये खुद भी हमें ये सब करने से नहीं रोक सकते, हम पूरी आजादी के साथ इनको इज्जत देंगे. हलाकि बचपन में मै सोचा करता था की जिसके घर के लोग मर जाते हैं वो इतनी धूम धाम से क्रिया कलाप कैसे कर लेते हैं. अब पता चला की ये ख़ुशी के क्षण होते है जब एक धनि बाप का पुत्र  बिना रोक टोक के धन का उपयोग अपनी मर्जी से कर  सकता है.<br />
बायल के नियम से चले तो तो पुत्र का प्यार पिता के जीवन के व्युत्क्रमानुपाती होता है और चार्ल्स के नियम से पुत्र का प्यार उसके &#8220;निपटने&#8221; के समानुपाती होता है.</div>
<div style="text-align: justify;">प्रेमी का प्यार प्रेमिका के भाई के व्युत्क्रमानुपाती होता है और उसकी सहेली के समानुपाती होता है. प्रोफेशनल मोहब्बत आर्कीमिडिज के सिध्धांत का पालन  करती है, प्रेमिका का प्यार प्रेमी द्वारा दिए गए गिफ्ट के बराबर होता है.</div>
<p>किसी बड़े और मंझे हुए मोहब्बतबाज ने कहा है &#8220;प्यार चन्द्रमा के समान होता है, या तो घटता है या बढ़ता है, स्थिर नहीं हो सकता.  यहाँ भी गणित बता जोड़ -घटना लगा गया और  मोहब्ब्तान्मुख युवा इसी परिभाषा को गले के निचे उतार दिल से लगा लेता है, कभी ढेर सारा प्यार बढाता है और और कभी ढेर सारा प्यार मिलके उसका स्वास्थ्य गिराता है.</p>
<p>अल्फ्रेल्ड नोबेल जो एक जुझारु  वैज्ञानिक के  साथ साथ जुझारू मोहब्बतबाज भी थे, संसार भर में दिया जाने वाला  नोबेल पुरस्कार के प्रणेता एक गणितज्ञ से दुखी हो पुरस्कार से  गणित विषय को ही हटा दिया.</p>
<div>अल्फ्रेड का एक सहयोगी था &#8220;गोस्टा मिटाग लेफ्लर&#8221;.  शायद गणित का मोहब्बत में व्यवहारिक उपयोग की शुरुवात इसी ने की. नोबेल अपने काम धाम में व्यस्त रहते, और मिटाग मोहब्ब्तानुभाव  अपने फार्मूलो से  नोबेल के प्रेयसी को हल करने में लगे रहते, फार्मूला काम करते ही नोबेल के दिली विज्ञान को मिटाग के प्रमेय का नाम दिया गया. जिससे अल्फ्रेड दुखी हो गणितज्ञों  को &#8220;नोबेल&#8221; न मिलने का श्राप दे डाला.</div>
<div style="text-align: justify;">आज के  परिपेक्ष्य में भी गणित और मोहब्बत का चोली दामन का साथ है, गुजरात के  लोकप्रिय नेता ने एक  की प्रेमिका को ५० करोड़ का कहा तो अगला बुरा मान गया, तीन चरणों से रिफाइन हो के आया मोहब्बत सिर्फ  पचास करोड़ का ? नहीं ये अन्याय है. अरे नेता जी आपको नहीं पता तीन चरणों से रिफाइन होने के बाद मोहब्बत परिष्कृत हो जाती है, मिलावटीपन  के इस ज़माने में इतनी शुध्द कोई है तो उसे पचास करोड़ का कह अपमान न करे, कृपया शुध्धता के कीमत को पहचाने. क्योकि इस प्रकार के  नेतावो को राजनितिक शुध्धता से जादा उनका शुध्द अनमोल &#8220;परिष्कृत&#8221;  मोहब्बत प्यारा है.</div>
<p>सादर</p>
<p>कमल कुमार सिंह<br />
३ नवंबर २०१२</p>
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		<title>ये जाहिल हैं, मुसलमान नहीं</title>
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		<pubDate>Tue, 11 Dec 2012 09:35:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>kamal</dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>

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		<description><![CDATA[बकरीद आई और दंगे की छाप छोड़ गयी, समझ नही आता शान्ति के इस धर्म में इतने जाहिल क्यों है कैसे है? निश्चित तौर पर ये मुसलमान बाद में जाहिल पहले है, इंसानी जाहिल, हालाकि  जानवरों और जाहिलो में और जानवरों में कोई ख़ास नहीं, क्योकि दोनों में सोचने और समझने की क्षमता का अभाव [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: justify;">
<div id="attachment_147" class="wp-caption aligncenter" style="width: 297px"><a href="http://kamalkumarsingh.com/wp-content/uploads/2012/12/download.jpg"><img class="size-full wp-image-147" title="download" src="http://kamalkumarsingh.com/wp-content/uploads/2012/12/download.jpg" alt="" width="287" height="176" /></a><p class="wp-caption-text">kamal</p></div>
</div>
<div style="text-align: justify;">बकरीद आई और दंगे की छाप छोड़ गयी, समझ नही आता शान्ति के इस धर्म में इतने जाहिल क्यों है कैसे है? निश्चित तौर पर ये मुसलमान बाद में जाहिल पहले है, इंसानी जाहिल, हालाकि  जानवरों और जाहिलो में और जानवरों में कोई ख़ास नहीं, क्योकि दोनों में सोचने और समझने की क्षमता का अभाव होता है और इनके साथ सरकार भी सलूक जानवरों जैसा ही कर रही और ये सोचते है की ये सरकार के शह पे हैं या सरकार इनपे रहमत बरसा रही है. ये इतने जाहिल हैं की खुद अपने खिलाफ हो रही साजिश को भी नहीं पहचान रहे.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">हालाकि  सभी जाहिल नहीं, मै एसे ढेर सारे मुसलमानों को जानता हूँ जो जहीन है लेकिन वो बिचारे करे भी तो क्या ? अब हो रहे दंगो में वो किसी को रोके भी तो कैसे ? हिन्दू को रोकेंगे तो पिटेंगे, मुसलमान को रोकेंगे तो जादा पिटेंगे. अलबत्ता वो इस झमेले में पड़ना नहीं चाहते. जो मुसलमान नौकरी पेशा है वो इसमें अपने हाथ जलाये या अपने बीवी बच्चो को पाले या अपना भविष्य देखें ? मुसलमान पढ़ा लिखा और जहीन होते ही समझदार हिंदुवो की तरह इन सब पचड़ो से दूर भाग आता है, लेकिन कीचड़ के छींटे से अपने को बचा नहीं पाता, गेहू के साथ घुन की तरह पिस जाता है. शक और गालियों के बाण उसपे भी चल जाते हैं. लिखने वाले भी एक ही तराजू में सबको तौल देते हैं.</p>
<p>जब भी ईद या बकरीद आता है इस तरह का दंगा होना अनिवार्य हो गया है ? क्या खुदा दंगा करके रोजे खोलने को कहता है ? नहीं बिलकुल नहीं, वास्तव में ये रोजे अपने लिए नहीं बल्कि नेतावो के लिए खोल रहे हैं, और अपने ही खिलाफ दूसरी कौम को लामबंद कर रहे हैं.</p></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">अभी हाल में फैजाबाद दंगे का कारन मालूम करने पर पता चला की मूर्ति विसर्जन (दुर्गा पूजा के बाद) के समय कुछ गुलाल मस्जिद परिसर पर गिर गया, इसी को लेकर दंगे भड़के थे, बाद में कुछ जाहिलो ने जो अपने आपको मुसलमान कहते हैं, ने बीकापुर में मदरसे के पास के इलाके हिंदुवो के घरो में आग लगा दी और इस तरह से कफर्यू लग गया. इस प्रकार के जाहिलो ने एक बार ने बल्कि कई बार इस्लाम के नाम पर दंगो की शुरुवात की, और सरकार इन्हें पकड़ने की बजाय वोट पर पकड़ बनाने में जादा दिखी.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">ये जाहिल नहीं समझ पा रहे की अपने ही कुकर्मो से ये इस्लाम को हिन्दुओ की नजर में जहरीला बना रहे है, हिन्दू  अपने कृत्य को &#8220;प्रतिक्रिया&#8221; का नाम दे के बच जाते हैं.  अब समझ ये नहीं आता की मस्जिद पे गुलाल गिरने से इस्लाम पे इसी कौन सी आफत टूट पड़ी, और यदि वो आफत टूट ही गयी तो तो घर जला के उस आफत को ये दूर कर पाए ? नहीं बल्कि ये दिन ब दिन दो समाजो में जहर भरते जा रहे हैं.<br />
फिर मुल्ले हिंदुवो की प्रतिक्रिया को आक्रमण बता के फिर से इनके दिमाग में जहर भरते है. की हिन्दू कौम मुसलमानों से नफरत करती है.  <em>तो भाई दोनों इसी देश के हैं, और यही रहना है, आप किसी के बहकावे में आ के क्रिया न करोगे तो तो प्रतिक्रया कहाँ से होगी, इसी देश में मौलाना कल्वी जी भी हैं,  जो सभी  हिन्दुवों के आदर पात्र हैं और बुखारी जैसे बिजली चोर भी. यदि सिर्फ मुसलमान के नाम पर ही नफरत करना होता तो हिन्दू &#8220;कल्वी&#8221; जी  से नफरत करते और अब्दुल कलाम से भी, ए आर रहमान से भी, इसी देश में फ़िल्मी दुनिया में  शाहरुख़ और सलमान को सबसे ऊँचे दर्जे पे रखने वाला हिन्दू समाज ही है क्योकि ये बाहुल्य है,</em> इस बात को दिमाग से निकलना ही होगा की हिन्दू सिर्फ &#8220;मुसलमान&#8221; नाम से नफरत करता है, वो कर्ता है तो जाहिलो के कुकृत्यों से, जिसको आपके मौलवी हिन्दुवों की नफरत बता देते हैं, ये समझना आपका भी काम है. अफ़सोस इस्लाम के नाम वाले इस देश में जाहिल जादा और जहीन कम है.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"> इस देश की जादा आबादी अभी भी गाँवों में रहती है. जहां एसे नौजवान रहते हैं जिनके हाथो को न काम है, न दिमागी खुराक, और एसे ही लोगो को ले के मौलवी इस्लाम के नाम पे अपनी ख़ुडक शांत करते दीखते है. इनको बड़ी आसानी से अपना शिकार बनाया जा सकता है, और यही वोटर भी होते हैं जो लामबंद हो के वोट करते हैं. और राजनेता इनके वोट ले के सत्ता तो पा जाते हैं, लेकिन इनको इनकी हालत पे ही छोड़ देते हैं, ताकि आगे फिर से इनके धार्मिक सुरक्षा के नाम पे इनसे वोट हथियाया जा सके, और दुसरे हिन्दुओ के खिलाफ भड़का के उन्हें एक तरफा वोट डालने के लिए दिमागी रूप से तैयार किया जा सके, क्योकि यदि इस कौम के जाहिलो का उत्थान कर दिया तो ये भी अपना भला बुरा समझने लगेंगे तब न इनके पास दंगो का समय होगा और न तोड़ फोड़ का, फिर ये भी सर उठा के चलने के लायक हो जायेंगे तो फिर धर्म के नाम पर इन नेताओं को सत्ता कौन दिलाएगा ?</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">मैंने इस्लामी धर्म के पे लिखने वालो को काफी देखा है, जो इस्लाम की अच्छाइयां तो बतलाते हैं, लेकिन कुरीति को दूर करने के नाम पे चुप्पी साध लेते हैं. एसा नहीं है की इस्लाम को रास्ता देने या कुरीति दूर करने के लिए  कोई आगे ही नहीं  आया, आये और कै आये लेकिन उनको अतिवादियों द्वारा शाजिश करके शहीद कर दिया गया. दूसरी सबसे बड़ी बात की इस्लामी धर्म कर्म पे लिखने वाले  कभी अपनी कौमो के गलत कार्यो   निंदा  करते दिखाई नहीं देते जिससे हिन्दू समाज ये भ्रम फैलना स्वाभाविक  है की मुसलमान धार्मिक रूप से दंगाई है.  <strong>क्योकि गलत कार्यों की निंदा  न करना शह ही माना जायेगा,</strong> जबकि वहीँ हिन्दू अपने ही कुरूतियो की निंदा ही नहीं बल्कि बाबा -बुबियो की पोल भी खोलता दिखाई पड़ता है. रही सही कसर मुल्ला मौलवी पूरी कर देते हैं जो इन्हें इस्लामिक राज्य का झूठा भ्रम दिखला के इन्हें धर्म की बेड़ियों में जकड़ पीछे जाने के लिए प्रयासरत है.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">इनकी सबसे बड़ी समस्या है इनकी जनसँख्या, जो धर्म के रस्सी से बधी हुयी है, जो मुसलमान पढ़े लिखे होते हैं वो आज नसबंदी करा रहे हैं, और अपना भला बुरा सोच सकते हैं, उन्हें पता है  एक चादर में कितने पाँव फैलाए जा सकते हैं, सुकून से रहने के लिए चादर का बड़ा होना जरुरी है, जिसके बुनने के लिए उन्हें जहिनियत का जुलाहा बनाना पड़ेगा, और वो बन भी रहे हैं, लेकिन इस प्रकार के लोगो की संख्या नगण्य है.</p>
<p>जिस दिन सबके हाथो को काम और पेट में रोटी होगी यकींन मानिए दंगो का नामोनिशान मिट जाएगा, लेकिन ये जिम्मेदारी जिनकी है वो इन्ही के भूखे पेटों से रोटियाँ छीन उसे अपने राजनीति के मशीन में डाल कर वोट बना लेते हैं. और इन्हें अपने हाल पे छोड़ देते हैं और इनके मजहबी पथ प्रदर्शक इन्हें रास्ता न दिखा अपनी रोटियाँ सेंकने में लगे है एसा लगता है जैसे इन्हें कौम मौलवी नहीं बल्कि नेतावो के सलाहकार है.</p></div>
<div style="text-align: justify;">
भूखा पेट ही अहिष्णु हो सकता है, जो सिर्फ हिन्दुओ के प्यार से नहीं भरा जा सकता. क्योकि भूखे पेट को प्यार चाहिए तो जरुर लेकिन पेट भरने के बाद, और ये प्रकृति का नियम भी है.</div>
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		<title>इनोसेंस आफ मुस्लिम्स, बिना बॉक्स आफिस के बड़ी हिट</title>
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		<pubDate>Sat, 22 Sep 2012 03:43:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>kamal</dc:creator>
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		<description><![CDATA[अमेरिका में बनी &#8220;इनोसेंस ऑफ़ इस्लाम&#8221;  एक चलचित्र आजकल  रजत पटल पे धूम भले न मचा रही हो, लेकिन मुसलमानों के दिलो में हलचल जरुर मची है.  खैर यदि इस ख़ास सिनेमा की बात की जाए तो हर प्रकार से घटिया  है, चाहे पात्र या चरित्र चित्रण दोनों ही. इसमें मोहम्मद की जीवनी को बड़ा [...]]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<div><a href="http://kamalkumarsingh.com/wp-content/uploads/2012/09/muhammd1.jpg"><img class="aligncenter size-full wp-image-136" title="muhammd" src="http://kamalkumarsingh.com/wp-content/uploads/2012/09/muhammd1.jpg" alt="" width="299" height="168" /></a></div>
<div style="text-align: justify;">अमेरिका में बनी &#8220;इनोसेंस ऑफ़ इस्लाम&#8221;  एक चलचित्र आजकल  रजत पटल पे धूम भले न मचा रही हो, लेकिन मुसलमानों के दिलो में हलचल जरुर मची है.  खैर यदि इस ख़ास सिनेमा की बात की जाए तो हर प्रकार से घटिया  है, चाहे पात्र या चरित्र चित्रण दोनों ही.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">इसमें मोहम्मद की जीवनी को बड़ा ही वीभत्स दिखाया गया है. कुरआन किसने लिखा या लिखाया ये दो  लोगो के विचारो में मतभेद हो सकता है, उसपे  बहस भी हो सकती है, होती भी है, लेकिन किसी के बारे में इस तरह की घटिया फिल्म बनाना पूरी तरह से निंदनीय है.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">खैर इसके प्रतिक्रिया स्वरुप दुनिया भर में मुसलमान &#8220;<strong>स्वभावतः</strong>&#8221; प्रदर्शन कर रहे है, कीसी एक आध देश में अमेरिका के राजदूतो को ही उड़ा दिया  गया है. और कई देशो में वीभत्स तरीके से प्रदर्शन भी हुए है.  विरोध करने के ये तरीका भी निंदनीय है.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">अभी हाल में  गाजियाबाद  में कुरआन जलाने के मामले पे  एक इस्लामी धर्माधिकारी ने पुलिस स्टेशन में ही जा के पुलिस को गोली मार दी जिससे वो सिपाही तो बिचारा स्वर्ग सिधार गया. लेकिन वो जला हुआ पन्ना ठीक नहीं हुआ.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">मुल्लों की मूर्खता का तो ये आलम है कि ये उस &#8220;अमेरिकी फिल्म&#8221; का विरोध प्रदर्शन  हमारे हिन्दुस्थान में भी कर रहे हैं (जबकि हमारी मुस्लिम सरपरस्त सरकार आनन्-फानन में इस फिल्म को हिन्दुस्थान में पहले ही बैन कर चुकी है, इस पर, यहाँ ध्यान देने की बात है कि मकबूल फ़िदा हुसैन द्वारा बनाई गयी  भारत माता और, हिन्दू देवी देवताओं की अश्लील तस्वीर बनाने पर इन्ही कांग्रेसियों ने उसे अभिव्यक्ति का अधिकार करार दिया था..) और तो और आजम खान जैसे   मुसलमान नेता तक धर्म को ऊपर रख भारत माता को डायन तक कह देते हैं.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">जरा सोचने वाली बात है की मोहम्मद का चित्रण क्यों नहीं हो सकता ? उसमे कोई बुत परस्ती भी नहीं है ?? पुरे दुनिया में राम , कृष्ण , और ईसा मसीह का चरित्र चित्रण होता है ताकि एक आमजन उनसे प्रेरणा ले सके गलत सही का अंतर समझ सके ?? लेकिन मोहम्मद का चरित्र चित्रण क्यों नहीं हो सकता ??? तो बात आके अटकती है की जरुर कही न कही लूप होल है .. चरित्र का चित्रण करने में जगजाहिर बातो को तो  दिखाना ही होगा, जो की ये  दिखा नहीं सकते. अब कैसे दिखाया जायेगा की मोहम्मद ने किन किन परिस्थितियों में किससे किससे और कितनी बार शादी की ?? हालाकि की चरित्र चित्रण  में कोई बुत परस्ती नहीं है..</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">यदि इस प्रकार से देखा जाए तो कुरआन भी महज एक किताब ही है, तो एक अखबार और कागद के किताब के लिए इतना उत्पात क्यों होता है ?? क्या इसलिए की मुसलमानों की पवित्र पुस्तक है ?? यदि हाँ तो ये भी बुतपरस्ती ही है&#8230; जैसे अल्लाह के मसेंज्र्र मुहामद की पूजा नहीं की जा सकती वैसे ही कुरआन की भी , जब जिसकी पूजा ही नहीं की जा सकती तो उसके लिए सियापा क्यों ??  किताब जलने या फुकने का ये मतलब तो नहीं है न की अलाह की बात ही मिट गयी , तो फिर चरित्र का चित्रण करने में भी क्या दिक्कत है ??  दूसरी बात कुरआन में अल्लाह को सर्वश्रेष्ठ माना  गया है , न की मुहम्मद को ,  तो मान लो किसी घटिया आदमी ने गन्दा चित्रण कर ही दिया तो सेंटी होने वाली क्या बात थी ?? अरे वो अल्लाह तो है नहीं न ?? और मसेंजर अल्लाह नहीं बन सकता ..</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">अब कुछ लोग कहेंगे तब मूर्ति टूटने पर हिन्दुओ को भी रोष नहीं व्यक्त करना  चाहिए, तो भाई , ये सब तो हमारे &#8220;रिचुअल्स&#8221; में है &#8220;सेरेमनी &#8221; में है, ये हमारी आस्था है, हमें बताया जाता है जो भी तुम्हारे आसपास है वन्दनीय है, सबकी इज्जत करो , किसी को कष्ट न दो &#8230; लेकिन अल्लाह ने कुरआन में कहा है जो भी है अल्लाह है , तुम कुछ भी करो बस अल्लाह को मानो , तो मुहम्मद के चित्रण पे  के लिए इतना सियापा क्यों ?? अल्लाह का चित्रण तो नहीं है न &#8230;.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<p style="text-align: justify;">मै ये कहना चाहता हूँ की कुरआन यदि आपकी पवित्र पुस्तक है तो आप किसी भी हद तक गुजर जाते हो, मरने मारने पे उतारू हो जाते हो, जबकि वो चाहे जीतनी चाहे छपवा लो, लेकिन वही अफगानिस्तान में, श्रीलंका, यहाँ तक की भारत समेत दुनिया भर में जहाँ भी इनका बस चलता है, मुर्तिया तोड़ने से बाज नहीं आते, जबकि एक मूर्ति टूटने के बाद दुबारा वैसी नहीं बनायीं जा सकती जैसी वो पहले थी. अरे भाई कम से कम वास्तुकला का नमूना मान का ही छोड़ दिया करो.</p>
<div style="text-align: justify;">तो जरा सोचिये बौध धर्मालंबियो को कितना प्रदर्शन करना चाहिए था ? या हिंदुवो को कितना  प्रदर्शन करना चाहिए ?? निश्चय ही हिन्दू ,बौध्ध  सिख्ख ईसाई और अन्य कौमे सहिष्णु  है या  इतना तो तय है की को जादा मार काट नहीं कर सकते जैसे की ये मुसलमान कौम करती है.अब ये कौम इतना दंगा या हिंसक प्रदर्शन  करती है ???  निश्चय ही ये कुरआन का असर होगा, अन्यथा दुनिया में और भी मजहब और समुदाय है जो न तो इतने कट्टर है न ही उत्पाती &#8230;</div>
<p style="text-align: justify;">&#8220;तुम बेवफा ही सही, लेकिन इश्क है तुमसे,</p>
<div style="text-align: justify;">खुद जल जायेंगे या जमाने को जला देंगे,&#8221;</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">एक तरफ तो कुछ बुध्दजीवी मुसलमान इस्लामी आतंकियों पे दलील देते हैं की कुछ घटिया मुसलमानों के खातिर हमारी कौम को बदनाम करना ठीक नहीं है, और उनका ये कहना भी जायज है, इसमें कोई बुराई भी नहीं,  मुठ्ठी भर कुछ  घटिया मुसलमानो की वजह से उन पर अंगुली उठाना गलत है, अब आईये दूसरा पहलू देखते हैं , तो मै  उन्ही मुसलमान भाईयो से पूछना चाहता हूँ, की यदि मान लो अमेरिका में किसी घटिया  इंसान ने कोई घटिया सी फिल्म बना ही दी तो क्या अधिकार था उस समुदाय से सम्बंधित एक राजदूत की हत्या करने की, जुल्म करने की  ??  तोड़ फोड़ करने की ??? और ये कोई पहली बार नहीं हुआ है, कोई सौ साल पहले भी स्वामी श्रधानंद समेत अन्य लोगो की हत्या भी मुसलमानों द्वारा सिर्फ  इसलिए की गयी की एक आर्यसमाजी ने इनके मुहम्मद के ऊपर कोई किताब लिख दी थी, उससे भी जादा आश्चर्य जनक बात ये है की ये  उस हत्यारे को ये अपना क्रांतिकारी, मसीहा और अल्लाह का बन्दा  मानते है . <strong> </strong></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><strong>ये कौम अपने लिए जो चाहती है वही दूसरो के लिए क्यों  नहीं करना चाहती.  यदि आप  चाहते है की कुछ घटिया मुसलमानों की वजह से (हालाकि अधिकतर दंगाई मुस्लिम ही होते है)  सारे मुसलमानों को न बदनाम न किया जाए तो यही आदत पहले आप खुद अपने आप में लाईये, किसी दुसरे देश की बात को ले के तीसरे देश में शुरू हो जाते है, उस व्यक्ति के समुदाय से सम्बंधित दुसरे व्यक्तियों को मारते है, उत्पात मचाते है, सरकारी सामान्य जन की वस्तुवो को जलाते हैं नष्ट करते है,ऐसे  समय में इन बुध्ध्जिवियों की  दलीले गायब हो जाती है.  </strong></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">सब मिला के मतला ये है की मोहम्मद के जीवनी का चित्रण होना चाहिए और उनकी अच्छाईयों को समाज में दिखाना चाहिए, कमियाँ तो लगभग सबमे होती है , खुद राम भी बारह कला संपन्न थे न सोलह की पूर्ण सोलह  कला, मोहम्मद भी खुद मैसेंजर थे  न की खुद  अल्लाह, तो जाहिर है कमियाँ  भी रही होंगी, लेकिन जो भी अच्छाइयां  थी उनको समाज को जानने का पूरी तरह  हक़ है ताकि एक सामान्य उनके बारे में जान सके उनके आदर्शो पे चलने का प्रयत्न कर सके, बजाय की कोई मानसिक  विक्षिप्त के द्वारा बनायी गयी एक एक घटिया फिल्म.</div>
<div style="text-align: justify;">अच्छा हुआ भारत सरकार ने इस सिनेमा को भारत में बैन कर दिया.</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">सादर</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;">कमल कुमार सिंह</div>
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