सत्ता ब्यूटी पार्लर है

आयरलैंड में एक प्रसिध्द व्यक्ति  और लेखक हुआ, जार्ज बनार्ड शा,  वह “लन्दन स्कुल आफ इकोनोमिक्स” के संस्थापको में से एक था.वह इंग्लैंड के साम्राज्यवाद निति से बड़ा दुखी रहता था, वह इंग्लैंड “कु-निति “का आलोचक था. उसका कहना था  इंग्लैंड वाले बनाने में बड़े निपुण हैं, सामान और लोगो को भी. नया सामान जब खपत न होता तो इंग्लैंड वाले अपने पादरी दुसरे देशो में भेज देते, बाद में उस देश में पादरियों पे उत्पीड़नका आरोप लगा जहाजो में अपने सैनिक भेज उसपे कब्ज़ा जमा अपना नया बाजार  तैयार कर लेते.

पादरी, इश्वर ही नहीं बल्कि नया बाजार भी उपलब्ध करवाता है. सन १६०० के आस पास उसने भारत के लिए भी यही रननिति  अपनाई. १९४७ में आजादी के बाद उसके सीने पे सांप लोटने लगा, क्योकि यहाँ स्वदेशी की आग लग गयी थी. वह दुखी था क्योकि वह दयालु है, परमेश्वर और बाजार का “कम्बो पैक” सदाचार में  मुफ्त में उपलब्ध करवाता है.

स्वदेशी ज्वाला में कही भारत जनता कहीं जल न जाएँ यह सोच के इंग्लैण्ड की आँखों में आंसू आने लगे. उसने अपनी रणनीति बदली अबकी पादरी न हो के महिलाओं का सहारा लिया गया. उसे पता था भारत में नारियो को माता, देवी शक्ति माना जाता है. नारी को अपनानाने में भारतवासी भी पीछे नहीं है. भारत ने  लेडी गोगो के गानों से लेकर वस्त्रो के आतंक से मुक्त रहने वाली “लीयोनी” जी तक को अपना लिया. उसने एक महिला को चुनकर भारत के उस समय के शक्तिशाली राजनैतिक परिवार के पुत्र के पास भेजा. उसने शायद भारतीय पुस्तके पढ़ी थी, उसे पता था की अप्सरावों को भेज किसी भी विश्वामित्र का तप भंग किया जा सकता है तो ये तो बस एक भारतीय राजनैतिक पुत्र है, यदि ये अपने झांसे में आ गया तो अपना धन्धा पहले से भी बढ़िया. हुआ भी यही, अंग्रेजी इन्द्र अपने अप्सरा को भारत में भेजने में सफल रहा. उसने प्रेममय “हवाले” से स्त्री को भारत में “इम्पोर्ट” किया, आप इसको “इम्पोज” भी कह सकते हैं. वह अप्सरा भारत आई और इस आधुनीक विश्वामित्र से कहा तुमने मुझे भारत लाके इस देश का और यूरोप का भला किया है, अब तुम्हारा काम पूरा हुआ, तुम्हारे जीवन का उद्देश्य सफल हुआ, अब तुम जाओ तुम्हारा काम बस इतना ही था, तुम्हारे इस पुन्य कार्य लिए हमारे पादरियों  ने स्वर्ग में एक स्पेशल ” होलीडे सेल” का निर्माण किया है. वही मौज मनाओ, यहाँ  का काम हम देख लेंगी, अब आप आराम करो.  और इस देश की जनता का क्या ? वसुधैव कुटुम्बकम सभी अपने है बस अपना उल्लू सीधा होना चाहिए.

सेर भर कबाब हो
एक अद्धा शराब हो
नूरजहाँ का राज हो
ख़ूब हो–  भले ही ख़राब हो  ——- (स्व श्री सुदामा पांडे)

भारत की  नारिन्मोख जनता ने इनको भी स्वीकार कर लिया, भारत के लिए असली  ग्लोबलाईजेशन का दौर यहीं से शुरू हुआ.  “वसुधैव  कुटुम्बकम” का इससे बड़ा नमूना क्या होगा जहा भारतवासी किसी भी देश के नारी को अपना मान लेते हैं, पहले भी उन्होंने अंग्रेजो को अपना भाई माना था, क्या हुआ जो कुछ  हिस्सा ले के भाग लिए, अब भाई है तो जाय्दादा में बटवारा भी होगा ही. ये तो उनका हक़ था. नाहक ही उन्हें लोग विदेशी लुटेरे कहते हैं.   

सत्ता मिलते ही सत्ताधीन  पहले कई साल तक सत्ता को समझने की कोशिश करता है, क्योकि वह अपने को सत्ता का पति और सत्ता को  अपने हरम की एक बंदी समझता है जिसका कन्यादान  मुर्ख जनता खुद करती है.  शुरुवात में  थोडा प्यार मनुहार करता है, फिर भोगता है,  फिर बांदियो सा व्यवहार करता है, वह भूल जाता  है की जागरूकता के इस समय में दुल्हन भी तलाक ले कहीं और जा सकती है.  अपने कर्म को बताने कुकर्म को छुपाने के लिए लालची “पड़ोस के देवरों” को लगा देता है जो जनता को ये बताते है की तुमने ठीक जगह कन्यादान किया वो सुखी है तुम भी खुश रहो.   देवर भी कैमरा ले के बड़े भईया को नीचा नहीं होने देते. दुल्हन  है भी तो एकदम सीधी भारतीय ब्रांड, एक हद तक सहने को तैयार, सामने वाला  चाहे कितना भी कुकर्मी हो उसे सहना ही पड़ता है, वो बात अलग है को वो सिसकती है, रोतीहै, आजाद होना चाहती है, लेकिन उसे कोई रास्ता दिखाई नहीं देता, अंततोगत्वा वह दुल्हे को तलाक का नोटिस दे इन्तजार करती है. नोटिस मिलने पर “यह”  चिंतित होता है. हाय ये क्या हुआ, क्या मेरा अब तलाक हो जायेगा? और यह कहीं और चली जाएगी ?कैसे रह पाउँगा मै इसके बिना ?  हमने सात जन्मो तक साथ जीने मरने की कसम खायी थी, इतनी जल्दी साथ छुट गया तो परमात्मा को क्या मुह दिखलाऊंगा.  नहीं नहीं यह नहीं हो सकता, ये मेरी है सिर्फ मेरी है, मेरे पुरखो ने न जाने कितनो का खून बहा के इसे छीना है, एसे न जाने दूंगा.और “यह” मुर्ख “बाबुल” से  अपनी मजबूत दावेदारी सीध्ह करने को मजमा करता है , जलसा करता है, सारे  उपक्रम  फिर से करता है.  इनके लिए सत्ता का मतलब बस इतना ही है.

हाल में रामलीला मैदान में हुए एक रैली के “त्रिफला चूर्ण” (माता -पुत्र और चचा) का भाषण रख रहा हु  जिससे  पता चलता है की ये जनता के हाजमा का कितना ख्याल करते हैं.  नेतावों की जनसेवा का अमरत्व भाव पता चलता है :-
जिसको आधी रोटी मिलती है वो पूरी खायेगा, जो आधा पेट खाता है वो पूरा पेट खायेगा, (भाई बिना सत्ता के मै भी आधा था, पहले अपना पूरा करूँ, पहले मै खाऊ, आखिर मै भी जनता हूँ. मै ठीक रहूँगा तो आप लोगो की भी सेवा होगी).
भारत एक बार फिर से खड़ा होगा पूरी दुनिया उसको एक बार फिर पहचानेगी, (यानि अभी तक ६० सालो में हमने उसे लंगड़ा कर रखा है, ताकि पहले हम खड़े हो सके, हम अपनी पहचान बना लें फेर बाकी का भी हो जायेगा).
मै बहुत आभारी हूँ आप दूर दूर आधे पेट हमारी रैली में आये आशा है आगे भी आधे पेट या खाली पेट अपनी हालत की परवाह किये बगैर हमारी रैली में आ देश को तरक्की के रास्ते पे ले जायेंगे. हमारी रैलियों में आईये  हमारे भाषण को सुनिए, आधा पेट तो आप वैसे ही भर जायेगा.

हमने इस देश में इन्फ्रास्टकचर पे ख़ास ध्यान दिया है आदर्श जैसी बिल्डिंगे बनायीं है जिससे जनता और नेता दोनों का पेट भरा है, बिल्डिंग देखिये और पेट भरिये, इतने पर भी खाली रहे तो हमारा क्या दोष ?  भ्रष्टाचारियों को दंड मिलेगा वो बात अलग है की हम उस दायरे में अपने आपको नहीं लायेंगे, हम अगर इन कानूनी लफडो में पद गए तो देश की तरक्की कौन करेगा ?..
हमारी पार्टी पर तरह तरह के आरोप लगाए जा रहे है, उसमे सच क्या है , झूठ क्या है , ये आपके विवेक पे निर्भर करता है , लेकिन एक बात आपको समझना होगा की जो शाशन में होता है वही सत्य है , वही शाश्वत है, नहीं तो है सत्ता की ताकत से बना लेंगे आप चिंता न करे आप बस सच के साथ रहें, बाकी आपके विवेक पे निर्भर है.
हमने ही सुचना का अधिकार लाया है, जिसके तहत कोई भी जानकारी आप ले सकते हैं, बशर्ते सरकार के भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में न हो, हम पैदायशी साफ़ पाक है, और आपको भी “साफ़” कर के रहेंगे.
हमारे विरोधी हमारे बारे में उलटी बाते करते रहें, लेकिन हम उनके बारे में कोई उलटी बात नहीं कहेंगे (क्योकि हम करने में विश्वाश रखते हैं) तभी एक लोकल महिला उठती है. अपना भाषण पद्धति है और साथ वाले नेतावों को “माननीय”, “सम्माननीय” जैसे प्रमाण पत्रों से नवाजती है.

एक नेता को दुसरे नेतावों को  “आदरनीय” और  “सम्मानानीय” शब्द  से नवाजना एसा लगता है जैसे एसा लगता है एक चोर दुसरे चोर को बड़े से बड़ा बताना चाहता हो ताकि उसकी बारी आये तो सामने वाला चोर भी उसे बड़ा बताये. आजादी के बाद जिन नेतावो ने चोरो को पकड़ने के लिए कड़े कानून बनाये आज उसी परिवार या दल के नेता चोरों को सर्टिफाईडी बनाने के कानून बना रहें हैं .सर्टिफाईडी चोर यानी जिनके लिए चोरी करना वैध है. इन चोर, डाकुवो को सम्मत बनाने के लिए, जनता के बीच पचाने के लिए त्रिफलाओ की पाचनपूर्ण  रैली का मख्हन से लपेटा “पाचक भाषण” परोसा जाता है. जिसको  जनता अभी समझ नहीं पा रही है. शायद जनता का जन्तत्व ख़त्म हो गया है.

”पता नहीं हम कहां से चल कर, कहां पहुंच कर ठहर गए हैं,
हमारे सीनों पे पांव रखकर, गधों के लश्कर गुजर गए हैं,
हमारी टूटन, तुम्हारे वादे, फना हुए कहां तेरे इरादे
जिन चेहरों पे है निगाह डाली, कई लबादे उतर गए हैं।”

नेता अपने चोर, डाकुवों वाले वीभत्स चहरे को छुपाने के लिए सत्ता का ब्यूटीपार्लर की तरह इस्तेमाल कर रहा है. और सत्ता के तंत्र इसके प्रसाधन है(मिडिया वगैरह) जिससे अपने चहरे मोहरे चाल चलन का ट्रिमिंग, फेशियल करा खुबसूरत चेहरा जनता के सामने रख रहा है. सच ही है, सत्ता में बहुत शक्ति है, चुड़ैल को देवी और राक्षस को देवता बना सकती है, लेकिन जनता को जनता के रूप में नहि बल्कि अपने साधन के लिए इस्तमाल कर रही है.

न कोई प्रजा है
न कोई तंत्र है
यह आदमी के खिलाफ़
आदमी का खुला सा
षड़यन्त्र है .———(स्व श्री सुदामा पांडे)

सादर

कमल कुमार सिंह

४ नवम्बर २०१२

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